Chapter 5 · Grammar
धातुरूप — धातु, पुरुष, वचन, पद, लकार
Verbs: Basics & Lakarasक्रिया का मूल रूप धातु है (पठ्, गम्, भू)। धातु में तिङ् प्रत्यय जुड़कर क्रिया बनती है। हर लकार में 3 पुरुष × 3 वचन = 9 रूप। धातुएँ 10 गणों में बँटी हैं और पद के अनुसार परस्मैपदी, आत्मनेपदी, उभयपदी होती हैं।
👤 3 पुरुषप्रथम पुरुष (अन्य): सः, सा, रामः, भवान् · मध्यम पुरुष: त्वम्, युवाम्, यूयम् (युष्मद्) · उत्तम पुरुष: अहम्, आवाम्, वयम् (अस्मद्)
🔢 3 वचनएकवचन (1) · द्विवचन (2) · बहुवचन (3 या अधिक)। हिन्दी में द्विवचन नहीं; संस्कृत में "दो" के लिए अलग रूप।
⚖️ 3 पदपरस्मैपद (-ति, -तः, -न्ति): पठति · आत्मनेपद (-ते, -एते, -न्ते): लभते · उभयपद (दोनों): करोति / कुरुते
तिङ् प्रत्यय (18) — मूल रूप
| पुरुष | परस्मैपद (9) | आत्मनेपद (9) | ||||
|---|---|---|---|---|---|---|
| प्रथम | तिप् | तस् | झि | त | आताम् | झ |
| मध्यम | सिप् | थस् | थ | थास् | आथाम् | ध्वम् |
| उत्तम | मिप् | वस् | मस् | इट् | वहि | महिङ् |
सूत्र: तिप्तस्झिसिप्थस्थमिब्वस्मस्तातांझथासाथांध्वमिड्वहिमहिङ् · पहले 9 = परस्मैपद, बाद के 9 = आत्मनेपद (तङानावात्मनेपदम्) · लः कर्मणि च भावे चाकर्मकेभ्यः — लकार कर्ता में, सकर्मक से कर्म में, अकर्मक से भाव में आता है।
10 लकार — कौन-सा काल / अर्थ
| लकार | काल / अर्थ | उदाहरण (पठ्) | लकार | काल / अर्थ | उदाहरण |
|---|---|---|---|---|---|
| लट् ⭐ | वर्तमान काल | पठति (पढ़ता है) | लिट् | परोक्ष भूत (आँखों से न देखा) | पपाठ |
| लृट् ⭐ | सामान्य भविष्यत् | पठिष्यति (पढ़ेगा) | लुट् | अनद्यतन भविष्यत् (आज के बाद) | पठिता |
| लङ् ⭐ | अनद्यतन भूत (आज से पहले) | अपठत् (पढ़ा) | लुङ् | सामान्य भूत | अपाठीत् / अपठीत् |
| लोट् ⭐ | आज्ञा, प्रार्थना, आशीष | पठतु (पढ़े) | लृङ् | हेतुहेतुमद् भूत (ऐसा होता तो…) | अपठिष्यत् |
| विधिलिङ् ⭐ | विधि, चाहिए, सम्भावना | पठेत् (पढ़ना चाहिए) | आशीर्लिङ् | आशीर्वाद | पठ्यात् |
| लेट् — केवल वेद में | ⭐ = UP Board / परीक्षा के 5 मुख्य लकार | ||||
लकार का श्लोक: लट् वर्तमाने लेट् वेदे भूते लुङ्लङ्लिटस्तथा। विध्याशिषोस्तु लिङ्लोटौ लुट् लृट् लृङ् च भविष्यति॥
(लृङ् का अर्थ भूत और भविष्य दोनों में होता है, जब एक क्रिया दूसरी पर टिकी हो।)
(लृङ् का अर्थ भूत और भविष्य दोनों में होता है, जब एक क्रिया दूसरी पर टिकी हो।)
10 गण: भ्वाद्यदादी जुहोत्यादिर्दिवादिः स्वादिरेव च। तुदादिश्च रुधादिश्च तनक्र्यादिचुरादयः॥
पहली धातु: भू (भ्वादि), अद्, हु, दिव्, सु, तुद्, रुध्, तन् (कृ इसी में), क्री, चुर्।
पहली धातु: भू (भ्वादि), अद्, हु, दिव्, सु, तुद्, रुध्, तन् (कृ इसी में), क्री, चुर्।
"पठिष्यति में लकार?" (लृट्) · "आज्ञा अर्थ में लकार?" (लोट्) · "'चाहिए' के लिए लकार?" (विधिलिङ्) · "अनद्यतन भूत में?" (लङ्) · "परोक्ष भूत?" (लिट्) · "कृ धातु किस गण की?" (तनादि) · "महिङ् किस पद/पुरुष का प्रत्यय?" (आत्मनेपद, उत्तम पुरुष बहुवचन) · "संस्कृत में कितने लकार?" (10)
धातुरूप — परस्मैपदी धातुएँ Parasmaipada Verbs
| भू (होना) | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन | पठ् (पढ़ना) | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| लट् (वर्तमान) | |||||||
| प्रथम | भवति | भवतः | भवन्ति | प्रथम | पठति | पठतः | पठन्ति |
| मध्यम | भवसि | भवथः | भवथ | मध्यम | पठसि | पठथः | पठथ |
| उत्तम | भवामि | भवावः | भवामः | उत्तम | पठामि | पठावः | पठामः |
| लृट् (भविष्यत्) — बीच में स्य / इष्य | |||||||
| प्रथम | भविष्यति | भविष्यतः | भविष्यन्ति | प्रथम | पठिष्यति | पठिष्यतः | पठिष्यन्ति |
| मध्यम | भविष्यसि | भविष्यथः | भविष्यथ | मध्यम | पठिष्यसि | पठिष्यथः | पठिष्यथ |
| उत्तम | भविष्यामि | भविष्यावः | भविष्यामः | उत्तम | पठिष्यामि | पठिष्यावः | पठिष्यामः |
| लङ् (भूत) — आगे अ (अट् आगम) | |||||||
| प्रथम | अभवत् | अभवताम् | अभवन् | प्रथम | अपठत् | अपठताम् | अपठन् |
| मध्यम | अभवः | अभवतम् | अभवत | मध्यम | अपठः | अपठतम् | अपठत |
| उत्तम | अभवम् | अभवाव | अभवाम | उत्तम | अपठम् | अपठाव | अपठाम |
| लोट् (आज्ञा) | |||||||
| प्रथम | भवतु | भवताम् | भवन्तु | प्रथम | पठतु | पठताम् | पठन्तु |
| मध्यम | भव | भवतम् | भवत | मध्यम | पठ | पठतम् | पठत |
| उत्तम | भवानि | भवाव | भवाम | उत्तम | पठानि | पठाव | पठाम |
| विधिलिङ् (चाहिए) — बीच में ए / इय् | |||||||
| प्रथम | भवेत् | भवेताम् | भवेयुः | प्रथम | पठेत् | पठेताम् | पठेयुः |
| मध्यम | भवेः | भवेतम् | भवेत | मध्यम | पठेः | पठेतम् | पठेत |
| उत्तम | भवेयम् | भवेव | भवेम | उत्तम | पठेयम् | पठेव | पठेम |
इसी तरह चलने वाली धातुएँ — केवल प्रथम पुरुष एकवचन
| धातु (अर्थ) | लट् | लृट् | लङ् | लोट् | विधिलिङ् |
|---|---|---|---|---|---|
| गम् (जाना) | गच्छति | गमिष्यति | अगच्छत् | गच्छतु | गच्छेत् |
| दृश् (देखना) | पश्यति | द्रक्ष्यति | अपश्यत् | पश्यतु | पश्येत् |
| स्था (ठहरना) | तिष्ठति | स्थास्यति | अतिष्ठत् | तिष्ठतु | तिष्ठेत् |
| पा (पीना) | पिबति | पास्यति | अपिबत् | पिबतु | पिबेत् |
| दा (देना, भ्वादि) | यच्छति | दास्यति | अयच्छत् | यच्छतु | यच्छेत् |
| अस् (होना, अदादि) | अस्ति · स्तः · सन्ति | भविष्यति | आसीत् · आस्ताम् · आसन् | अस्तु · मध्यम: एधि | स्यात् · स्याताम् · स्युः |
अस् लट्: अस्ति स्तः सन्ति · असि स्थः स्थ · अस्मि स्वः स्मः। लृट् में अस् का भू हो जाता है (भविष्यति)। धातु-आदेश (पाघ्राध्मास्था... सूत्र): पा → पिब, घ्रा → जिघ्र, स्था → तिष्ठ, दाण् → यच्छ, दृश् → पश्य, सद् → सीद · इषुगमियमां छः: गम् → गच्छ, इष् → इच्छ, यम् → यच्छ। ये आदेश केवल लट्, लङ्, लोट्, विधिलिङ् में; लृट् में मूल धातु (गमिष्यति, द्रक्ष्यति)।
गम्, दृश्, स्था, पा, दा के सभी 45 रूप पठ् जैसे — बस "पठ" की जगह गच्छ / पश्य / तिष्ठ / पिब / यच्छ रखो: गच्छामि, पश्यथः, अतिष्ठन्, पिबेयुः। लृट् में गमिष्य / द्रक्ष्य / स्थास्य / पास्य / दास्य + ति, तः, न्ति…
धातुरूप — आत्मनेपदी, उभयपदी और मेल Atmanepada, Ubhayapada & Agreement
| लभ् (पाना) | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन | लभ् | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| लट् | लृट् | ||||||
| प्रथम | लभते | लभेते | लभन्ते | प्रथम | लप्स्यते | लप्स्येते | लप्स्यन्ते |
| मध्यम | लभसे | लभेथे | लभध्वे | मध्यम | लप्स्यसे | लप्स्येथे | लप्स्यध्वे |
| उत्तम | लभे | लभावहे | लभामहे | उत्तम | लप्स्ये | लप्स्यावहे | लप्स्यामहे |
| लङ् | लोट् | ||||||
| प्रथम | अलभत | अलभेताम् | अलभन्त | प्रथम | लभताम् | लभेताम् | लभन्ताम् |
| मध्यम | अलभथाः | अलभेथाम् | अलभध्वम् | मध्यम | लभस्व | लभेथाम् | लभध्वम् |
| उत्तम | अलभे | अलभावहि | अलभामहि | उत्तम | लभै | लभावहै | लभामहै |
| विधिलिङ्: लभेत · लभेयाताम् · लभेरन् | लभेथाः · लभेयाथाम् · लभेध्वम् | लभेय · लभेवहि · लभेमहि | |||||||
| धातु | लट् | लृट् | लङ् | लोट् | विधि. |
|---|---|---|---|---|---|
| सेव् (सेवा) | सेवते | सेविष्यते | असेवत | सेवताम् | सेवेत |
| वन्द् (प्रणाम) | वन्दते | वन्दिष्यते | अवन्दत | वन्दताम् | वन्देत |
| मुद् (प्रसन्न) | मोदते | मोदिष्यते | अमोदत | मोदताम् | मोदेत |
| वृध् (बढ़ना) | वर्धते | वर्धिष्यते | अवर्धत | वर्धताम् | वर्धेत |
| कृ (करना) | परस्मैपद (प्र. पु.) | आत्मनेपद (प्र. पु.) |
|---|---|---|
| लट् | करोति कुरुतः कुर्वन्ति | कुरुते कुर्वाते कुर्वते |
| लृट् | करिष्यति | करिष्यते |
| लङ् | अकरोत् अकुरुताम् अकुर्वन् | अकुरुत |
| लोट् | करोतु · म.पु. कुरु · उ.पु. करवाणि | कुरुताम् · कुरुष्व · करवै |
| विधि. | कुर्यात् कुर्याताम् कुर्युः | कुर्वीत |
कृ लट् (परस्मै.) पूरा: करोति कुरुतः कुर्वन्ति · करोषि कुरुथः कुरुथ · करोमि कुर्वः कुर्मः। लङ् उत्तम: अकरवम् अकुर्व अकुर्म। उभयपद का नियम: क्रिया का फल कर्ता को मिले तो आत्मनेपद, दूसरे को मिले तो परस्मैपद (स्वरितञितः कर्त्रभिप्राये क्रियाफले)। उपसर्ग से पद बदलना: वि/परा + जि → विजयते, पराजयते (विपराभ्यां जेः) · नि + विश् → निविशते (नेर्विशः) · वि/आ/परि + रम् → विरमति, आरमति (व्याङ्परिभ्यो रमः) · अनु/परा + कृ → अनुकरोति (अनुपराभ्यां कृञः)।
कर्ता और क्रिया का मेल
| नियम | उदाहरण |
|---|---|
| क्रिया का पुरुष और वचन कर्ता जैसा (कर्तृवाच्य में) | बालकाः क्रीडन्ति · त्वं पठसि · आवां गच्छावः |
| भवत् (आप) के साथ सदा प्रथम पुरुष | भवान् गच्छति · भवन्तः पठन्ति |
| "च" से जुड़े कर्ता: वचन जोड़कर (2 → द्विवचन, 3+ → बहुवचन) | रामः श्यामः च पठतः · रामः, श्यामः, मोहनः च पठन्ति |
| "च" में उत्तम पुरुष हो तो उत्तम, नहीं तो मध्यम हो तो मध्यम | त्वम् अहं च गच्छावः · सः त्वं च पठथः |
| "वा / अथवा" से जुड़े कर्ता: पास वाले कर्ता के अनुसार | रामः वा श्यामः वा गच्छति · ते वा त्वं वा पठसि |
"गम् लृट् प्र.पु. एक.?" (गमिष्यति) · "दृश् लृट्?" (द्रक्ष्यति) · "लभ् लृट् प्र.पु. एक.?" (लप्स्यते) · "कृ लोट् उत्तम पुरुष एक.?" (करवाणि) · "अस् विधिलिङ् प्र.पु. एक.?" (स्यात्) · "आसन् में लकार/पुरुष/वचन?" (लङ्, प्रथम, बहु.) · "युवाम् ___ (पठ्)" (पठथः) · "आत्मनेपदी धातु पहचानो" (लभ्, सेव्, वन्द्, मुद्) · "अहं त्वं च ___ (गम्)" (गच्छावः)