Chapter 7 · Grammar
वाच्य और वाच्य परिवर्तन
Voice: Kartri, Karma, Bhavaक्रिया किसके अनुसार चल रही है — कर्ता, कर्म या भाव — इसे वाच्य कहते हैं। संस्कृत में तीन वाच्य हैं। सूत्र: लः कर्मणि च भावे चाकर्मकेभ्यः (लकार कर्ता में; सकर्मक धातु से कर्म में; अकर्मक से भाव में)।
| वाच्य | कर्ता | कर्म | क्रिया | उदाहरण |
|---|---|---|---|---|
| कर्तृवाच्य | प्रथमा | द्वितीया | कर्ता के पुरुष-वचन में; धातु का अपना पद | रामः ग्रन्थं पठति। |
| कर्मवाच्य (सकर्मक) | तृतीया | प्रथमा | कर्म के पुरुष-वचन में; धातु + य (यक्); सदा आत्मनेपद | रामेण ग्रन्थः पठ्यते। |
| भाववाच्य (अकर्मक) | तृतीया | — (नहीं) | सदा प्रथम पुरुष एकवचन; धातु + य; आत्मनेपद | रामेण हस्यते। |
कर्तृ → कर्म: (1) कर्ता प्रथमा → तृतीया (2) कर्म द्वितीया → प्रथमा (3) धातु + य + आत्मनेपद, क्रिया कर्म के पुरुष-वचन में। कर्तृ → भाव: कर्ता → तृतीया, क्रिया प्रथम पुरुष एकवचन आत्मनेपद। लकार वही रहता है।
य (यक्) केवल लट्, लङ्, लोट्, विधिलिङ् में (सार्वधातुके यक्)। लृट् में य नहीं, सीधा आत्मनेपद रूप: रामेण ग्रन्थः पठिष्यते · मया हसिष्यते। लङ्: मया पत्रम् अलिख्यत · लोट्: त्वया पाठः पठ्यताम् · विधिलिङ्: पठ्येत।
कर्ता की तृतीया: अहम् → मया · आवाम् → आवाभ्याम् · वयम् → अस्माभिः · त्वम् → त्वया · युवाम् → युवाभ्याम् · यूयम् → युष्माभिः · सः → तेन · सा → तया · ते → तैः · ताः → ताभिः · भवान् → भवता · बालकाः → बालकैः
कर्मवाच्य / भाववाच्य के धातु-रूप (लट्, प्र. पु. एक.)
| धातु | रूप | धातु | रूप | धातु | रूप | धातु | रूप |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| पठ् | पठ्यते | गम् | गम्यते | कृ | क्रियते | दृश् | दृश्यते |
| पा | पीयते | स्था | स्थीयते | दा | दीयते | गै | गीयते |
| श्रु | श्रूयते | नी | नीयते | वच् | उच्यते | ग्रह् | गृह्यते |
| भू | भूयते | हस् | हस्यते | लिख् | लिख्यते | ज्ञा | ज्ञायते |
| यज् | इज्यते | वस् | उष्यते | स्वप् | सुप्यते | हृ | ह्रियते |
हल किए उदाहरण
कर्तृ → कर्म
अहं पत्रं लिखामि → मया पत्रं लिख्यते
त्वं फलानि खादसि → त्वया फलानि खाद्यन्ते
ते ग्रन्थान् पठन्ति → तैः ग्रन्थाः पठ्यन्ते
सा गीतं गायति → तया गीतं गीयते
बालकः मां पश्यति → बालकेन अहं दृश्ये (कर्म अस्मद् → उत्तम पुरुष)
सः त्वां पृच्छति → तेन त्वं पृच्छ्यसे
अहं पत्रं लिखामि → मया पत्रं लिख्यते
त्वं फलानि खादसि → त्वया फलानि खाद्यन्ते
ते ग्रन्थान् पठन्ति → तैः ग्रन्थाः पठ्यन्ते
सा गीतं गायति → तया गीतं गीयते
बालकः मां पश्यति → बालकेन अहं दृश्ये (कर्म अस्मद् → उत्तम पुरुष)
सः त्वां पृच्छति → तेन त्वं पृच्छ्यसे
कर्तृ → भाव
बालकः हसति → बालकेन हस्यते
अहं तिष्ठामि → मया स्थीयते
यूयं गच्छथ → युष्माभिः गम्यते
ते धावन्ति → तैः धाव्यते
क्त से भूतकाल
रामः ग्रन्थं पठितवान् (क्तवतु) → रामेण ग्रन्थः पठितः (क्त)
सीता हसितवती → सीतया हसितम् (भाव में नपुं.)
बालकः हसति → बालकेन हस्यते
अहं तिष्ठामि → मया स्थीयते
यूयं गच्छथ → युष्माभिः गम्यते
ते धावन्ति → तैः धाव्यते
क्त से भूतकाल
रामः ग्रन्थं पठितवान् (क्तवतु) → रामेण ग्रन्थः पठितः (क्त)
सीता हसितवती → सीतया हसितम् (भाव में नपुं.)
"रामेण ग्रन्थः पठ्यते — कौन-सा वाच्य?" (कर्मवाच्य) · "मया स्थीयते — ?" (भाववाच्य) · "कर्मवाच्य में कर्ता की विभक्ति?" (तृतीया) · "कृ का कर्मवाच्य?" (क्रियते)
अनुवाद — हिन्दी से संस्कृत Translation into Sanskrit
अनुवाद के 4 कदम: (1) कर्ता ढूँढो → उसका पुरुष और वचन तय करो (2) काल देखो → लकार चुनो (है = लट्, गा/गी = लृट्, था/किया = लङ्, आज्ञा = लोट्, चाहिए = विधिलिङ् या तव्यत्) (3) कारक-चिह्न (को, से, के लिए, में) → विभक्ति; उपपद शब्द (बिना, सह, नमः, परितः) हो तो उसकी विभक्ति (4) क्रिया कर्ता के पुरुष-वचन में।
उपपद विभक्ति वाले वाक्य
| हिन्दी | संस्कृत | नियम |
|---|---|---|
| गाँव के चारों ओर वृक्ष हैं। | ग्रामं परितः वृक्षाः सन्ति। | परितः → द्वितीया |
| राम और श्याम के बीच मोहन है। | रामं श्यामं च अन्तरा मोहनः अस्ति। | अन्तरा → द्वितीया |
| पिता पुत्र के साथ जाता है। | पिता पुत्रेण सह गच्छति। | सह → तृतीया |
| वह आँख से काना है। | सः अक्ष्णा काणः अस्ति। | अङ्ग-विकार → तृतीया |
| ज्ञान के बिना सुख नहीं। | ज्ञानेन / ज्ञानं / ज्ञानात् विना सुखं न। | विना → तृ./द्वि./पं. |
| गुरु को नमस्कार। | गुरवे नमः। | नमः → चतुर्थी |
| बालक को लड्डू अच्छा लगता है। | बालकाय मोदकं रोचते। | रुच् → चतुर्थी |
| राजा ब्राह्मण को गाय देता है। | नृपः विप्राय गां ददाति। | सम्प्रदान → चतुर्थी |
| वृक्ष से पत्ता गिरता है। | वृक्षात् पत्रं पतति। | अपादान → पञ्चमी |
| वह बाघ से डरता है। | सः व्याघ्रात् बिभेति। | भी → पञ्चमी |
| गङ्गा हिमालय से निकलती है। | गङ्गा हिमालयात् प्रभवति। | प्रभव → पञ्चमी |
| राम मोहन से अधिक चतुर है। | रामः मोहनात् पटुतरः अस्ति। | तुलना (तरप्) → पञ्चमी |
| छात्रों में सुरेश सबसे चतुर है। | छात्रेषु / छात्राणां सुरेशः पटुतमः। | निर्धारण → सप्तमी/षष्ठी |
| वृक्ष के ऊपर पक्षी हैं। | वृक्षस्य उपरि खगाः सन्ति। | उपरि → षष्ठी |
| सूर्य उगने पर कमल खिलते हैं। | सूर्ये उदिते कमलानि विकसन्ति। | सति सप्तमी |
| मोहन पढ़ने में कुशल है। | मोहनः पठने कुशलः अस्ति। | कुशल → सप्तमी |
काल और लकार वाले वाक्य
| हिन्दी | संस्कृत | हिन्दी | संस्कृत |
|---|---|---|---|
| हम दोनों जाते हैं। | आवां गच्छावः। | तुम सब कल जाओगे। | यूयं श्वः गमिष्यथ। |
| उसने भोजन किया। | सः भोजनम् अकरोत् / कृतवान्। | कल (बीता) वर्षा हुई। | ह्यः वर्षा अभवत्। |
| तुम पढ़ो। | त्वं पठ। | सत्य बोलना चाहिए। | सत्यं वदेत् / वक्तव्यम्। |
| बच्चे खेलने के लिए जाते हैं। | बालकाः क्रीडितुं गच्छन्ति। | पढ़कर खेलो। | पठित्वा क्रीड। |
काम के अव्यय: अद्य (आज) · श्वः (आने वाला कल) · ह्यः (बीता कल) · परश्वः (परसों, आगे) · अत्र, तत्र, कुत्र, सर्वत्र · यदा-तदा, कदा · अपि (भी), एव (ही), च (और), न (नहीं), इति · शीघ्रम्, शनैः · किमर्थम् (क्यों)।
"अहं पत्रं लिखामि का कर्मवाच्य?" (मया पत्रं लिख्यते) · "भाववाच्य में क्रिया?" (प्र.पु. एक.) · "युष्माभिः ___ (गम्, भाव)" (गम्यते) · "गाँव के चारों ओर" का शुद्ध अनुवाद (ग्रामं परितः) · "हरि को भक्ति अच्छी लगती है" (हरये रोचते भक्तिः) · "वह कल आएगा" (सः श्वः आगमिष्यति) · "शुद्ध वाक्य चुनो" — विभक्ति और पुरुष-वचन की गलती पकड़ो।