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Chapter 14 · Poetics

छंद — अंग, मात्रा और गण

Metre (Chhand): Basics
🎵 छंदवर्ण, मात्रा, यति, गति और तुक के नियमों में बँधी रचना छंद कहलाती है। छंदशास्त्र के आचार्य: पिंगल (इसलिए छंदशास्त्र = ‘पिंगलशास्त्र’)।
3 प्रकारमात्रिक (= मात्राएँ गिनी जाएँ: दोहा, चौपाई) · वर्णिक (= वर्ण और गण गिने जाएँ: इंद्रवज्रा, सवैया) · मुक्तक (= वर्ण गिने जाएँ, गण का बंधन नहीं: कवित्त)
कई पुस्तकें: मात्रिक, वर्णिक, मुक्त (कवित्त = वर्णिक मुक्तक / दंडक)।

छंद के अंग

अंगअर्थ
चरण / पादछंद की पंक्ति का भाग; प्रायः 4 चरण। पहला-तीसरा = विषम चरण, दूसरा-चौथा = सम चरण
वर्णअक्षर; ह्रस्व = लघु, दीर्घ = गुरु (आधे व्यंजन अलग नहीं गिने जाते)
मात्रावर्ण बोलने में लगा समय: लघु (।) = 1, गुरु (ऽ) = 2
यतिपढ़ते समय रुकने का स्थान (विराम) · गति = पढ़ने का प्रवाह / लय
तुकचरणों के अंत में समान ध्वनि
गणतीन वर्णों का समूह (लघु-गुरु के क्रम से) — कुल 8 गण
लघु (।) — 1 मात्राह्रस्व स्वर और उनसे बने वर्ण: अ, इ, उ, ऋ · क, कि, कु, कृ · चंद्रबिंदु वाले ह्रस्व: हँ, अँ (हँसी = ।ऽ)
गुरु (ऽ) — 2 मात्राएँदीर्घ स्वर: आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ · अनुस्वार वाला वर्ण (कं, अं) · विसर्ग वाला (दुः) · संयुक्त व्यंजन से पहले का वर्ण (सत्य में ‘स’ गुरु) · हलंत से पहले का वर्ण

8 गण — सूत्र: यमाताराजभानसलगा

गणरूपउदाहरणगणरूपउदाहरण
यगण (यमाता)। ऽ ऽयशोदाजगण (जभान)। ऽ ।जलेश
मगण (मातारा)ऽ ऽ ऽमायावीभगण (भानस)ऽ । ।भारत
तगण (ताराज)ऽ ऽ ।ताराजनगण (नसल)। । ।नमन
रगण (राजभा)ऽ । ऽरामजीसगण (सलगा)। । ऽसरिता
सूत्र के किसी भी अक्षर से शुरू करके तीन अक्षर लो — वही उस गण का रूप: य-मा-ता = ।ऽऽ (यगण) · ज-भा-न = ।ऽ। (जगण)। ‘ल’ = लघु, ‘गा’ = गुरु।
मात्रा गिनो: राम = ऽ। = 3 · कमल = ।।। = 3 · संसार = ऽऽ। = 5 · सत्य = ऽ। = 3 · दुःख = ऽ। = 3 · हँसना = ।।ऽ = 4 (चंद्रबिंदु से गुरु नहीं बनता)
दोहे का चरण: "श्री गुरु चरन सरोज रज" = श्री(2) + गुरु(1+1) + चरन(1+1+1) + सरोज(1+2+1) + रज(1+1) = 13 ✓
"गणों की संख्या?" (8) · "‘ऽ।ऽ’ कौन-सा गण?" (रगण) · "‘भारत’ में कौन-सा गण?" (भगण) · "संयुक्त व्यंजन से पहले का वर्ण?" (गुरु) · "यति किसे कहते हैं?" (रुकने का स्थान)

मात्रिक छंद Matrik Metres

छंदप्रकारनियमउदाहरण
चौपाईसम मात्रिक4 चरण, हर चरण में 16 मात्राएँ; चरण के अंत में जगण (।ऽ।) या तगण (ऽऽ।) नहीं"बंदउँ गुरु पद पदुम परागा। सुरुचि सुबास सरस अनुरागा॥" (रामचरितमानस)
दोहाअर्धसम मात्रिकविषम चरण 13, सम चरण 11 मात्राएँ (हर पंक्ति 24); सम चरण के अंत में गुरु-लघु (ऽ।); विषम चरण के आरंभ में जगण (।ऽ।) वर्जित; तुक सम चरणों में"श्री गुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि।"
सोरठाअर्धसम मात्रिकदोहे का उलटा: विषम चरण 11, सम चरण 13; तुक विषम चरणों में"जो सुमिरत सिधि होइ, गन नायक करिबर बदन। करउ अनुग्रह सोइ, बुद्धि रासि सुभ गुन सदन॥"
रोलासम मात्रिक4 चरण, हर चरण में 24 मात्राएँ; 11-13 पर यति"नीलांबर परिधान हरित पट पर सुंदर है। सूर्य-चंद्र युग मुकुट, मेखला रत्नाकर है॥"
कुंडलियाविषम (मिश्र) मात्रिकदोहा + रोला = 6 चरण; दोहे का अंतिम चरण रोले के आरंभ में दोहराया जाता है; जिस शब्द से शुरू, उसी से अंतगिरिधर कविराय: "बिना बिचारे जो करै, सो पाछे पछिताय…"
हरिगीतिकासम मात्रिक4 चरण, हर चरण में 28 मात्राएँ; 16-12 पर यति; अंत में लघु-गुरु"कहती हुई यों उत्तरा के, नेत्र जल से भर गए। हिम के कणों से पूर्ण मानो, हो गए पंकज नए॥"
बरवैअर्धसम मात्रिकविषम चरण 12, सम चरण 7 मात्राएँ; सम चरण के अंत में जगण (।ऽ।)"वाम अंग शिव शोभित, शिवा उदार। सरद सुवारिद में जनु, तड़ित बिहार॥"
छंदमात्राएँ (एक पंक्ति / चरण)
चौपाई16 × 4 चरण
दोहा13 + 11 = 24
सोरठा11 + 13 = 24
रोला11 + 13 = 24 (हर चरण)
हरिगीतिका16 + 12 = 28
बरवै12 + 7 = 19
सम, अर्धसम, विषम: सम = चारों चरण बराबर (चौपाई, रोला, हरिगीतिका) · अर्धसम = पहला-तीसरा और दूसरा-चौथा आपस में बराबर (दोहा, सोरठा, बरवै) · विषम = दो छंदों का मेल / असमान (कुंडलिया)।
दोहा 13-11, सोरठा 11-13 (उलटा) · चौपाई 16 · रोला 24 · हरिगीतिका 28 · बरवै 12-7 · कुंडलिया = दोहा + रोला।
प्रश्न: "निज मनु मुकुरु सुधारि" — मात्राएँ? → नि(1)ज(1) म(1)नु(1) मु(1)कु(1)रु(1) सु(1)धा(2)रि(1) = 11 → दोहे का सम चरण।
प्रश्न: "बंदउँ गुरु पद पदुम परागा" → बं(2)द(1)उँ(1) गु(1)रु(1) प(1)द(1) प(1)दु(1)म(1) प(1)रा(2)गा(2) = 16 → चौपाई का चरण।
"दोहे के विषम चरण में मात्राएँ?" (13) · "सोरठा किसका उलटा है?" (दोहा) · "कुंडलिया किन दो छंदों से मिलकर बनता है?" (दोहा + रोला) · "हरिगीतिका के प्रत्येक चरण में मात्राएँ?" (28) · "चौपाई के एक चरण में मात्राएँ?" (16) · "बरवै के सम चरण में?" (7)

वर्णिक और मुक्तक छंद Varnik & Muktak Metres

छंदवर्ण (हर चरण)गण-क्रमरूप
इंद्रवज्रा11तगण, तगण, जगण + गुरु, गुरुऽऽ। ऽऽ। ।ऽ। ऽऽ
"माता यशोदा हरि को जगावै"
उपेंद्रवज्रा11जगण, तगण, जगण + गुरु, गुरु।ऽ। ऽऽ। ।ऽ। ऽऽ
"बड़ा कि छोटा कुछ काम कीजै"
वसंततिलका14तगण, भगण, जगण, जगण + गुरु, गुरुऽऽ। ऽ।। ।ऽ। ।ऽ। ऽऽ
"भू में रमी शरद की कमनीयता थी"
मत्तगयंद सवैया (मालती)237 भगण + 2 गुरु(ऽ।।) × 7 + ऽऽ
सुमुखी सवैया237 जगण + लघु, गुरु(।ऽ।) × 7 + ।ऽ
सुंदरी सवैया258 सगण + गुरु(।।ऽ) × 8 + ऽ
इंद्रवज्रा बनाम उपेंद्रवज्रा: दोनों 11 वर्ण, अंत ‘जगण + दो गुरु’ एक जैसा। केवल पहला गण अलग: इंद्रवज्रा तगण (ऽऽ।) से, उपेंद्रवज्रा जगण (।ऽ।) से — यानी उपेंद्रवज्रा का पहला वर्ण लघु।
सवैया = 22 से 26 वर्णों का वर्णिक छंद; एक ही गण की आवृत्ति (मत्तगयंद में भगण, सुमुखी में जगण, सुंदरी में सगण)। उदाहरण (मत्तगयंद, रसखान): "या लकुटी अरु कामरिया पर, राज तिहूँ पुर को तजि डारौं।"

मुक्तक छंद — मनहर (कवित्त / घनाक्षरी)

नियमहर चरण में 31 वर्ण; 16-15 पर यति; अंतिम वर्ण गुरु। वर्ण गिने जाते हैं, पर गण का कोई बंधन नहीं — इसलिए ‘मुक्तक’।
उदाहरण (भूषण)"इंद्र जिमि जंभ पर, बाड़व सुअंभ पर, रावन सदंभ पर, रघुकुल राज है।" — शिवाजी की वीरता का वर्णन।
मुक्तक छंद ≠ मुक्त छंद। मुक्तक (कवित्त) में वर्ण-संख्या का नियम है · मुक्त छंद (निराला ने चलाया, ‘जूही की कली’) में न मात्रा, न वर्ण, न तुक का बंधन।

छंद पहचानो — झटपट तालिका

संकेतछंदसंकेतछंद
13-11 मात्राएँ, दो पंक्तियाँदोहा11-13 मात्राएँ, तुक विषम चरणों मेंसोरठा
16 मात्राएँ × 4 चरण (मानस)चौपाई6 चरण, शुरू-अंत एक शब्दकुंडलिया
11 वर्ण, पहला गण तगण / जगणइंद्रवज्रा / उपेंद्रवज्रा31 वर्ण, 16-15 यतिमनहर (कवित्त)
"इंद्रवज्रा में कितने वर्ण?" (11) · "उपेंद्रवज्रा का पहला गण?" (जगण) · "वसंततिलका में वर्ण?" (14) · "मत्तगयंद सवैया में कौन-सा गण 7 बार?" (भगण) · "कवित्त (मनहर) के एक चरण में वर्ण?" (31) · "मुक्त छंद के प्रवर्तक?" (निराला)
Read it? Now practise

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