Chapter 12 · Poetics
अलंकार — शब्दालंकार
Figures of Speech: Sound-based💎 अलंकारअलंकार = आभूषण। काव्य की शोभा बढ़ाने वाले शब्द और अर्थ के चमत्कार।
🔤 शब्दालंकारचमत्कार शब्द में — यानी उसी अर्थ का दूसरा शब्द रखने पर अलंकार नहीं रहता: अनुप्रास, यमक, श्लेष (और वक्रोक्ति, पुनरुक्तिप्रकाश, वीप्सा)।
💭 अर्थालंकारचमत्कार अर्थ में; पर्याय रखने पर भी बना रहे: उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा… · दोनों में चमत्कार हो तो उभयालंकार।
1. अनुप्रास — वर्णों (एक या अनेक) की बार-बार आवृत्ति (= दोहराव)
| भेद | पहचान | उदाहरण |
|---|---|---|
| छेकानुप्रास | अनेक व्यंजनों की आवृत्ति स्वरूप और क्रम से केवल एक बार | "रीझि रीझि रहसि रहसि हँसि हँसि उठै, साँसैं भरि आँसू भरि कहत दई दई" |
| वृत्यनुप्रास | एक या अनेक वर्ण अनेक बार | "चारु चंद्र की चंचल किरणें, खेल रही हैं जल-थल में" (मैथिलीशरण गुप्त) · "तरनि-तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाए" (भारतेंदु) |
| लाटानुप्रास | शब्द / वाक्यांश वही, अन्वय (जोड़) बदलने से अर्थ बदले | "पूत सपूत तो क्यों धन संचय? पूत कपूत तो क्यों धन संचय?" |
| अंत्यानुप्रास | चरणों के अंत में तुक (एक जैसे स्वर-व्यंजन) | "रघुकुल रीति सदा चलि आई। प्रान जाहुँ बरु बचनु न जाई॥" (तुलसीदास) |
| श्रुत्यनुप्रास | एक ही उच्चारण स्थान के वर्णों की आवृत्ति | "तुलसीदास सीदत निसिदिन देखत तुम्हारि निठुराई" — दंत्य त, द, स, न |
2. यमक — एक शब्द कई बार, हर बार अलग अर्थ
"कनक कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय। या खाए बौराय जग, वा पाए बौराय॥" (बिहारी) — पहला कनक = सोना, दूसरा = धतूरा (सोने में धतूरे से सौ गुनी मादकता; कुछ पुस्तकें क्रम उलटा लिखती हैं, पर दोनों अर्थ यही) · "काली घटा का घमंड घटा" — बादल / कम हुआ · "तीन बेर खाती थीं, वे तीन बेर खाती हैं" (भूषण) — बार / बेर का फल
3. श्लेष — शब्द के एक ही प्रयोग में एक साथ कई अर्थ (श्लेष = चिपका हुआ)
उदाहरण"रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून। पानी गए न ऊबरे, मोती मानुष चून॥" (रहीम) — अंतिम पंक्ति के एक ‘पानी’ में तीन अर्थ एक साथ: मोती की चमक, मनुष्य की इज़्ज़त, चून (आटे) का जल
और उदाहरण"चरन धरत चिंता करत, चितवत चारों ओर। सुबरन को खोजत फिरत, कवि, व्यभिचारी, चोर॥" — एक ‘सुबरन’ में: कवि के लिए सुंदर वर्ण (शब्द), व्यभिचारी के लिए सुंदर रूप, चोर के लिए सोना
गिनती नहीं, अर्थ देखो: शब्द चाहे कितनी बार आए — अगर हर प्रयोग का अपना अलग एक अर्थ है → यमक (कनक-कनक) · अगर किसी एक प्रयोग में ही कई अर्थ एक साथ चिपके हैं → श्लेष (रहीम का ‘पानी’ तीन बार आया है, फिर भी श्लेष, क्योंकि अंतिम ‘पानी’ में तीन अर्थ हैं)।
"‘चारु चंद्र की चंचल किरणें’ में अलंकार?" (अनुप्रास) · "‘कनक कनक ते सौ गुनी’ में?" (यमक) · "‘पानी गए न ऊबरे, मोती मानुष चून’ में?" (श्लेष) · "यमक और श्लेष में अंतर?" · "शब्दालंकार चुनो: उपमा / यमक / रूपक" (यमक)
अर्थालंकार — उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा Simile, Metaphor, Poetic Fancy
4. उपमा — दो वस्तुओं में समानता (तुलना)
उपमा के 4 अंगउपमेय — जिसकी तुलना की जाए (मन) · उपमान — जिससे तुलना की जाए (पीपल का पत्ता) · वाचक शब्द — तुलना बताने वाला शब्द (सा, सी, से, सम, सरिस, समान, जैसा, ज्यों, इव) · साधारण धर्म — दोनों में जो गुण एक जैसा है (डोलना)
| "पीपर पात सरिस मन डोला" (तुलसीदास) | |
|---|---|
| उपमेय | मन |
| उपमान | पीपर (पीपल) का पात (पत्ता) |
| वाचक | सरिस (समान) |
| साधारण धर्म | डोला (हिलना) |
भेदपूर्णोपमा: चारों अंग हों — "हरिपद कोमल कमल-से" · लुप्तोपमा: कोई अंग छिपा — "मुख चंद्र-सा" (धर्म ‘सुंदर’ लुप्त) · मालोपमा: एक उपमेय, कई उपमान (माला) — "हिरनी से मीन से, सुखंजन समान चारु, अमल कमल से, विलोचन तिहारे हैं" (आँखों के लिए कई उपमान)
और उदाहरण"मुख मयंक-सम मंजु मनोहर" · "सागर-सा गंभीर हृदय हो" · "नील गगन-सा शांत हृदय था"
5. रूपक — उपमेय पर उपमान का अभेद आरोप (दोनों एक मान लिए)
उदाहरण"चरण-कमल बंदौं हरि राई" (सूरदास) — चरण ही कमल · "मैया मैं तो चंद्र-खिलौना लैहौं" (सूरदास) · "पायो जी मैंने राम-रतन धन पायो" (मीराबाई) — राम-नाम रूपी रत्न
रूपक के भेदसांग (= अंगों सहित): "बीती विभावरी जाग री! अंबर-पनघट में डुबो रही तारा-घट ऊषा-नागरी।" (जयशंकर प्रसाद) · निरंग (= केवल एक आरोप, अंग नहीं): चरण-कमल · परंपरित (= एक रूपक दूसरे रूपक का कारण बने)
उपमा या रूपक? — योजक चिह्न (-) कसौटी नहीं है (उपमा में भी "चंद्र-सा", "कमल-से" लिखते हैं)। कसौटी: वाचक शब्द (सा, सम, सरिस, समान, जैसा) हो → उपमा · वाचक न हो और उपमेय-उपमान को एक ही मान लिया हो (मुख-चंद्र, चरण-कमल, ‘रूपी’) → रूपक
6. उत्प्रेक्षा — उपमेय में उपमान की संभावना (मानो…)
वाचक शब्द और उदाहरणमनु, मानो, जनु, जानो, मनहुँ, जनहुँ, मानहुँ — इनमें से कोई दिखे तो प्रायः उत्प्रेक्षा।
"उस काल मारे क्रोध के, तनु काँपने उसका लगा। मानो हवा के ज़ोर से, सोता हुआ सागर जगा॥" (मैथिलीशरण गुप्त)
"उस काल मारे क्रोध के, तनु काँपने उसका लगा। मानो हवा के ज़ोर से, सोता हुआ सागर जगा॥" (मैथिलीशरण गुप्त)
उदाहरण"सोहत ओढ़े पीत पट, स्याम सलोने गात। मनहुँ नीलमनि-सैल पर, आतप परयो प्रभात॥" (बिहारी) — पीले वस्त्र में श्याम कृष्ण, मानो नीलम के पर्वत पर सुबह की धूप पड़ी हो
"‘पीपर पात सरिस मन डोला’ में अलंकार?" (उपमा) · "‘चरण-कमल बंदौं हरि राई’?" (रूपक) · "‘मनहुँ नीलमनि-सैल पर आतप परयो प्रभात’?" (उत्प्रेक्षा) · "उपमा में ‘सरिस’ क्या है?" (वाचक शब्द) · "‘मुख चंद्र-सा’ में उपमेय?" (मुख)
अर्थालंकार — संदेह से अतिशयोक्ति तक Doubt, Delusion, Hyperbole & more
| अलंकार | पहचान | उदाहरण |
|---|---|---|
| 7. संदेह | उपमेय को देखकर संदेह बना रहे — यह है या वह? (कि, या, अथवा) | "सारी बीच नारी है कि नारी बीच सारी है। सारी ही की नारी है कि नारी ही की सारी है॥" |
| 8. भ्रांतिमान | समानता के कारण पक्का भ्रम — एक को दूसरा समझकर क्रिया कर बैठना | "नाक का मोती अधर की कांति से, बीज दाड़िम का समझकर भ्रांति से। देखकर सहसा हुआ शुक मौन है, सोचता है अन्य शुक यह कौन है॥" · "पाँय महावर देन को, नाइन बैठी आय। फिरि-फिरि जानि महावरी, एड़ी मीड़त जाय॥" |
| 9. अनन्वय | उपमेय की तुलना उसी से — उपमेय ही उपमान (कोई और बराबरी का नहीं) | "राम से राम, सिया-सी सिया" |
| 10. प्रतीप | प्रसिद्ध उपमान को उपमेय से हीन बताना (उलटी उपमा) | "सिय मुख समता किमि करै, चंद बापुरो रंक" — चंद्रमा बेचारा सीता के मुख की बराबरी कैसे करे |
| 11. दृष्टांत | उपमेय-वाक्य और उपमान-वाक्य में बिंब-प्रतिबिंब (= एक बात को दूसरे उदाहरण से समझाना); वाचक शब्द नहीं | "करत-करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान। रसरी आवत जात ते, सिल पर परत निसान॥" |
| 12. अतिशयोक्ति | बात को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर (लोक-सीमा से बाहर) कहना | "हनुमान की पूँछ में, लगन न पाई आग। लंका सिगरी जल गई, गए निसाचर भाग॥" · "आगे नदिया पड़ी अपार, घोड़ा कैसे उतरे पार। राणा ने सोचा इस पार, तब तक चेतक था उस पार॥" |
संदेह या भ्रांतिमान? संदेह = मन डोलता रहे, निर्णय नहीं (यह है या वह?) · भ्रांतिमान = गलत चीज़ को पक्का मान लिया और उसी अनुसार काम भी कर दिया (तोता मोती को अनार का दाना समझ बैठा)।
उपमा, अनन्वय, प्रतीप: उपमा = उपमेय उपमान जैसा · अनन्वय = उपमेय अपने जैसा ही, कोई दूसरा नहीं · प्रतीप = उपमान ही उपमेय से हीन (चंद्र बेचारा)।
अलंकार पहचानो — संकेत शब्द
| संकेत | अलंकार | संकेत | अलंकार |
|---|---|---|---|
| सा, सी, सम, सरिस, समान, ज्यों | उपमा | मनु, मानो, जनु, जानो, मनहुँ | उत्प्रेक्षा |
| वाचक नहीं, उपमेय-उपमान एक (चरण-कमल, रूपी) | रूपक | कि, या, अथवा — निर्णय नहीं | संदेह |
| भ्रम से काम कर बैठना | भ्रांतिमान | ‘X से X’ (राम से राम) | अनन्वय |
| उपमान को नीचा दिखाना | प्रतीप | दो वाक्य, बिना वाचक (ज्यों / जैसे हो तो उदाहरण) | दृष्टांत |
| असंभव बढ़ा-चढ़ाकर बात | अतिशयोक्ति | वर्ण-आवृत्ति · शब्द हर बार अलग अर्थ · एक प्रयोग में कई अर्थ | अनुप्रास · यमक · श्लेष |
प्रश्न: "मुख मानो चंद्रमा है" → ‘मानो’ → उत्प्रेक्षा · "मुख चंद्रमा के समान है" → ‘समान’ → उपमा · "मुख-चंद्र" → अभेद → रूपक · "मुख तो मुख ही है, उसके जैसा कोई नहीं" → अनन्वय
"‘सारी बीच नारी है कि नारी बीच सारी है’ में अलंकार?" (संदेह) · "‘हनुमान की पूँछ में लगन न पाई आग’?" (अतिशयोक्ति) · "‘करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान’?" (दृष्टांत) · "‘राम से राम, सिया-सी सिया’?" (अनन्वय) · "‘नाक का मोती अधर की कांति से…’?" (भ्रांतिमान)
अन्य प्रमुख अलंकार More Figures of Speech (often asked)
पिछले पन्नों के 12 अलंकारों के अलावा ये भी अक्सर पूछे जाते हैं — पहचान और एक मानक उदाहरण:
| अलंकार | पहचान | उदाहरण |
|---|---|---|
| पुनरुक्तिप्रकाश (शब्द) | एक ही शब्द लगातार दोहराकर भाव को और गहरा करना (अर्थ वही रहे) | "मधुर-मधुर मेरे दीपक जल" (महादेवी वर्मा) |
| वीप्सा (शब्द) | हर्ष, शोक, घृणा, आदर आदि भाव के आवेग में शब्द दोहराना, प्रायः विस्मयादिबोधक के साथ | "छि! छि! यह कैसा काम!" · "हाय! हाय! यह क्या हो गया!" (वाक्य-उदाहरण) |
| वक्रोक्ति (शब्द) | वक्ता के कथन का श्रोता दूसरा अर्थ लगा ले (श्लेष या काकु / स्वर-भंगिमा से) | "को तुम? हैं घनश्याम हम। तो बरसो कित जाय॥" — घनश्याम = कृष्ण, पर सुनने वाली ने बादल समझा |
| मानवीकरण | जड़ वस्तु या प्रकृति पर मनुष्य के भाव / क्रियाएँ आरोपित | "मेघ आए बड़े बन-ठन के सँवर के" (सर्वेश्वरदयाल सक्सेना) |
| विरोधाभास | बात में विरोध दिखे, पर वास्तव में विरोध न हो | "या अनुरागी चित्त की, गति समुझै नहिं कोय। ज्यों-ज्यों बूड़ै स्याम रँग, त्यों-त्यों उज्ज्वल होय॥" (बिहारी) — काले रंग में डूबकर उजला होना |
| व्यतिरेक | उपमेय को उपमान से श्रेष्ठ बताना, कारण सहित | "संत हृदय नवनीत समाना। कहा कबिन्ह पर कहै न जाना॥ निज परिताप द्रवै नवनीता। पर दुख द्रवहिं संत सुपुनीता॥" (तुलसीदास) |
| विभावना | कारण के बिना कार्य होना | "बिनु पद चलै सुनै बिनु काना। कर बिनु करम करै बिधि नाना॥" (तुलसीदास) |
| विशेषोक्ति | कारण होते हुए भी कार्य न होना | "नेहु न नैननि को कछू, उपजी बड़ी बलाय। नीर भरे नित प्रति रहैं, तऊ न प्यास बुझाय॥" (बिहारी) |
| उल्लेख | एक ही वस्तु का अनेक प्रकार से वर्णन (अलग-अलग लोग अलग रूप में देखें) | "जिन्ह कें रही भावना जैसी। प्रभु मूरति देखी तिन्ह तैसी॥" (तुलसीदास) |
| अपह्नुति | उपमेय का निषेध करके उपमान की स्थापना (यह वह नहीं, यह तो…) | "सुनहु नाथ रघुबीर कृपाला। बंधु न होइ मोर यह काला॥" |
| उदाहरण | एक बात कहकर ज्यों, जैसे आदि वाचक से दूसरी बात उदाहरण के रूप में जोड़ना | "बूँद अघात सहैं गिरि कैसे। खल के बचन संत सह जैसे॥" (तुलसीदास) |
| अन्योक्ति | अप्रस्तुत (किसी और) के बहाने प्रस्तुत (असली व्यक्ति) की बात कहना | "नहिं पराग नहिं मधुर मधु, नहिं बिकास इहि काल। अली कली ही सौं बंध्यो, आगें कौन हवाल॥" (बिहारी) — भौंरे के बहाने राजा को सीख |
विभावना बनाम विशेषोक्ति: विभावना = कारण नहीं, फिर भी कार्य (बिना पैर चलना) · विशेषोक्ति = कारण है, फिर भी कार्य नहीं (आँखों में पानी भरा, फिर भी प्यास नहीं बुझी)।
पुनरुक्तिप्रकाश बनाम यमक / अनुप्रास: पुनरुक्तिप्रकाश में पूरा शब्द दोहराया, अर्थ वही (मधुर-मधुर) · यमक में अलग-अलग अर्थ (कनक-कनक) · ‘रीझि रीझि रहसि रहसि…’ पुस्तकों में छेकानुप्रास के उदाहरण के रूप में छपती है — यही पंक्ति पूछी जाए तो अनुप्रास · ‘मधुर-मधुर मेरे दीपक जल’ जैसी पंक्ति (एक ही शब्द लगातार, भाव गहरा करने को) → पुनरुक्तिप्रकाश। दृष्टांत बनाम उदाहरण: दृष्टांत में वाचक नहीं, उदाहरण में ज्यों / जैसे।
उभयालंकार: जहाँ शब्द और अर्थ दोनों में चमत्कार हो — दो रूप: संसृष्टि (अलंकार तिल-तंडुल की तरह अलग-अलग पहचाने जाएँ) और संकर (नीर-क्षीर की तरह घुले-मिले)।
"‘मेघ आए बड़े बन-ठन के सँवर के’ में अलंकार?" (मानवीकरण) · "‘बिनु पद चलै सुनै बिनु काना’?" (विभावना) · "‘को तुम? हैं घनश्याम हम’?" (वक्रोक्ति) · "‘मधुर-मधुर मेरे दीपक जल’?" (पुनरुक्तिप्रकाश) · "‘ज्यों-ज्यों बूड़ै स्याम रँग, त्यों-त्यों उज्ज्वल होय’?" (विरोधाभास)