Chapter 8 · Unseen passages and comprehension
अपठित गद्यांश और पद्यांश — हल करने की विधि
Unseen Prose & Verse: Methodअपठित = जो पहले न पढ़ा हो। Super TET की भाषा वाली इकाई में "अपठित गद्यांश, पद्यांश, व्याकरण एवं बोधगम्यता" पर प्रश्न आते हैं। उत्तर अंश में ही होता है; व्याकरण (विभक्ति, प्रत्यय, सन्धि, समास) के प्रश्न भी उसी अंश के शब्दों से बनते हैं।
गद्यांश: 5 कदम
1. पहले प्रश्न पढ़ो, फिर अंश।
2. अंश दो बार पढ़ो: पहली बार भाव, दूसरी बार उत्तर पर निशान।
3. प्रश्नवाचक शब्द से उत्तर का रूप तय करो (नीचे टेबल)।
4. उत्तर उसी विभक्ति-वचन में, जैसे प्रश्न पूछे।
5. शीर्षक: छोटा, पूरे अंश का मुख्य विचार; अक्सर पहले या अन्तिम वाक्य में।
1. पहले प्रश्न पढ़ो, फिर अंश।
2. अंश दो बार पढ़ो: पहली बार भाव, दूसरी बार उत्तर पर निशान।
3. प्रश्नवाचक शब्द से उत्तर का रूप तय करो (नीचे टेबल)।
4. उत्तर उसी विभक्ति-वचन में, जैसे प्रश्न पूछे।
5. शीर्षक: छोटा, पूरे अंश का मुख्य विचार; अक्सर पहले या अन्तिम वाक्य में।
पद्यांश (श्लोक): 5 कदम
1. श्लोक में 4 पाद (चरण) होते हैं; अनुष्टुप् छन्द के हर पाद में 8 अक्षर।
2. पहले सन्धि-विच्छेद करो (वसुधैव = वसुधा + एव)।
3. अन्वय बनाओ: कर्ता → कर्म / अन्य पद → क्रिया (गद्य का क्रम)।
4. हर पद का अर्थ, फिर पूरा भावार्थ।
5. प्रश्न का उत्तर अन्वय से ढूँढो।
1. श्लोक में 4 पाद (चरण) होते हैं; अनुष्टुप् छन्द के हर पाद में 8 अक्षर।
2. पहले सन्धि-विच्छेद करो (वसुधैव = वसुधा + एव)।
3. अन्वय बनाओ: कर्ता → कर्म / अन्य पद → क्रिया (गद्य का क्रम)।
4. हर पद का अर्थ, फिर पूरा भावार्थ।
5. प्रश्न का उत्तर अन्वय से ढूँढो।
प्रश्नवाचक शब्द → उत्तर का रूप
| प्रश्न | पूछता है | उत्तर में | प्रश्न | पूछता है | उत्तर में |
|---|---|---|---|---|---|
| कः / का / किम् | कौन, क्या | प्रथमा | कस्य / कस्याः | किसका | षष्ठी |
| कम् / काम् | किसको | द्वितीया | कस्मिन् / कस्याम् | किसमें | सप्तमी |
| केन / कया | किससे (साधन), किसके साथ | तृतीया | कुत्र | कहाँ | स्थान (प्रायः सप्तमी) |
| कस्मै / कस्यै | किसके लिए | चतुर्थी | कदा | कब | समय (प्रातः, अद्य…) |
| कस्मात् / कस्याः | किससे (अलग) | पञ्चमी | कति / किमर्थम् / कथम् | कितने / क्यों / कैसे | संख्या / चतुर्थी या तुमुन् / रीति |
बोधगम्यता — क्या-क्या पूछा जाता है
🎯 मुख्य भाव / शीर्षकपूरा अंश किस बात पर है? शीर्षक एक-दो शब्द का: "उद्यमस्य महत्त्वम्", "विद्या", "पर्यावरणम्"। केवल एक वाक्य वाला शीर्षक मत चुनो।
🔍 पद-परिचयसंज्ञा: शब्द, लिङ्ग, विभक्ति, वचन (बालकाः = बालक, पुं., प्रथमा, बहु.) · क्रिया: धातु, लकार, पुरुष, वचन (पठन्ति = पठ्, लट्, प्र.पु., बहु.) · प्रत्यय, सन्धि, समास।
🔁 विशेषण-विशेष्य, कर्ता-क्रिया"हरिताः वृक्षाः" — विशेषण (हरिताः) विशेष्य (वृक्षाः) के लिङ्ग-विभक्ति-वचन में। "अत्र 'सः' कस्य कृते प्रयुक्तः?" — सर्वनाम किस संज्ञा के लिए आया।
"गद्यांश का उचित शीर्षक?" · "'कृषकाः' पद में विभक्ति-वचन?" · "'उत्थाय' में प्रत्यय?" · "'हरिताः' किसका विशेषण?" · "'सः' सर्वनाम किसके लिए?" · "'मनोरथैः' में विभक्ति?" · "'वसुधा' का पर्याय?" · "'उद्यम' का विलोम?" — हर प्रश्न का उत्तर अंश में ही।
बोधगम्यता — पर्यायवाची और विलोम Synonyms & Antonyms
अपठित अंश के किसी शब्द का पर्याय (समान अर्थ) या विलोम (उल्टा अर्थ) पूछा जाता है। विकल्प में वही शब्द चुनो जो अंश में आए शब्द के लिङ्ग और अर्थ से मेल खाए।
पर्यायवाची शब्द
| शब्द | पर्यायवाची | शब्द | पर्यायवाची |
|---|---|---|---|
| जलम् | नीरम्, वारि, सलिलम्, तोयम्, अम्बु | वृक्षः | तरुः, पादपः, विटपः, द्रुमः |
| सूर्यः | रविः, दिवाकरः, भास्करः, आदित्यः, दिनकरः | पुष्पम् | कुसुमम्, सुमनः, प्रसूनम् |
| चन्द्रः | शशी, सोमः, इन्दुः, सुधांशुः, निशाकरः | नदी | सरित्, तटिनी, तरङ्गिणी |
| पृथ्वी | वसुधा, धरा, भूमिः, मही, अवनिः | समुद्रः | सागरः, जलधिः, उदधिः, रत्नाकरः |
| अग्निः | अनलः, पावकः, वह्निः | गृहम् | सदनम्, भवनम्, निकेतनम्, आलयः |
| वायुः | पवनः, अनिलः, समीरः, मारुतः | नेत्रम् | नयनम्, लोचनम्, चक्षुः |
| राजा | नृपः, भूपः, नरेशः, भूपतिः | हस्तः | करः, पाणिः |
| कमलम् | पङ्कजम्, जलजम्, अम्बुजम्, सरोजम् | पुत्रः | सुतः, तनयः, आत्मजः |
| खगः | विहगः, पक्षी, अण्डजः, विहङ्गः | सिंहः | केसरी, मृगराजः, मृगेन्द्रः |
| मेघः | जलदः, घनः, अम्बुदः, पयोदः, वारिदः | सर्पः | भुजगः, उरगः, अहिः, पन्नगः |
| हस्ती | गजः, करी, द्विपः, कुञ्जरः | रात्रिः | निशा, रजनी, यामिनी, विभावरी |
| अश्वः | तुरगः, हयः, घोटकः, वाजी | गङ्गा | भागीरथी, जाह्नवी |
विलोम शब्द
| शब्द | विलोम | शब्द | विलोम | शब्द | विलोम |
|---|---|---|---|---|---|
| सुखम् | दुःखम् | गुणः | दोषः | स्वर्गः | नरकः |
| ज्ञानम् | अज्ञानम् | आदानम् | प्रदानम् | उत्तमः | अधमः |
| धर्मः | अधर्मः | प्राचीनम् | नवीनम्, अर्वाचीनम् | सम्पत्तिः | विपत्तिः |
| मित्रम् | शत्रुः | सुप्तः | जागृतः | सुलभः | दुर्लभः |
| उन्नतिः | अवनतिः | उदारः | कृपणः | स्वदेशः | विदेशः |
| दिवा | रात्रिः, नक्तम् | आगमनम् | गमनम् | शीतः | उष्णः |
| उद्यमः | आलस्यम् | आशा | निराशा | जीवनम् | मरणम् |
| लघु | गुरु | आदरः | अनादरः | पुण्यम् | पापम् |
| निजः | परः | कृतज्ञः | कृतघ्नः | बन्धनम् | मोक्षः, मुक्तिः |
| उदयः | अस्तः | पण्डितः | मूर्खः | प्रश्नः | उत्तरम् |
| जयः | पराजयः | सज्जनः | दुर्जनः | सत्यम् | असत्यम्, अनृतम् |
| लाभः | हानिः | अमृतम् | विषम् |
विलोम बनाने के 3 रास्ते: (1) अ / अन् जोड़ो: धर्म → अधर्म, आदर → अनादर (2) उपसर्ग बदलो: उन्नति → अवनति, आदान → प्रदान, सु-लभ → दुर्-लभ, सम्पत्ति → विपत्ति (3) अलग शब्द: मित्र → शत्रु, अमृत → विष।
"'वसुधा' का पर्याय?" (पृथ्वी / धरा) · "'पावकः' किसका पर्याय?" (अग्नि) · "'कृतज्ञः' का विलोम?" (कृतघ्नः) · "इनमें 'जलम्' का पर्याय नहीं" (अनलः) · "'उद्यम' का विलोम?" (आलस्यम्)
अभ्यास — अपठित गद्यांश Practice: Unseen Prose
गद्यांश 1 — भारतं ग्रामाणां देशः अस्ति। ग्रामेषु कृषकाः निवसन्ति। ते प्रातः उत्थाय क्षेत्राणि गच्छन्ति। कृषकाः परिश्रमेण अन्नम् उत्पादयन्ति, अतः ते अन्नदातारः कथ्यन्ते। ग्रामं परितः हरिताः वृक्षाः सन्ति। वृक्षाः अस्मभ्यं फलानि, छायां, शुद्धं वायुं च यच्छन्ति। अस्माभिः वृक्षाः न कर्तनीयाः, अपितु रोपणीयाः।
| प्रश्न | उत्तर | कारण / नियम |
|---|---|---|
| कृषकाः कुत्र निवसन्ति? | ग्रामेषु | "कुत्र" → स्थान, सप्तमी बहु. |
| कृषकाः किं कथ्यन्ते? | अन्नदातारः | अन्नदातृ, प्रथमा बहु. |
| कृषकाः केन अन्नम् उत्पादयन्ति? | परिश्रमेण | "केन" → तृतीया (करण) |
| वृक्षाः अस्मभ्यं किं किं यच्छन्ति? | फलानि, छायां, शुद्धं वायुं च | कर्म → द्वितीया |
| "उत्थाय" में प्रकृति-प्रत्यय? | उत् + स्था + ल्यप् | उपसर्ग है → ल्यप् |
| "ग्रामं परितः" में द्वितीया क्यों? | "परितः" के योग में | उपपद विभक्ति |
| "हरिताः" किसका विशेषण? | वृक्षाः | पुं., प्रथमा, बहु. — मेल |
| "कर्तनीयाः", "रोपणीयाः" में प्रत्यय? | अनीयर् | "चाहिए" अर्थ |
| "कथ्यन्ते" किस वाच्य में? | कर्मवाच्य | धातु + य, आत्मनेपद |
| उचित शीर्षक? | "ग्रामजीवनं वृक्षाः च" | पूरे अंश का भाव |
गद्यांश 2 — महात्मनः गान्धिमहोदयस्य जन्म 1869 तमे वर्षे पोरबन्दरनगरे अभवत्। तस्य पिता करमचन्दः माता च पुतलीबाई आस्ताम्। सः सदा सत्यम् अहिंसां च अपालयत्। देशस्य स्वतन्त्रतायै सः बहुवारं कारागारम् अगच्छत्। अतः जनाः तं राष्ट्रपितरं मन्यन्ते।
| प्रश्न | उत्तर | कारण / नियम |
|---|---|---|
| गान्धिमहोदयस्य जन्म कुत्र अभवत्? | पोरबन्दरनगरे | सप्तमी एक. |
| सः किं किम् अपालयत्? | सत्यम् अहिंसां च | द्वितीया (कर्म) |
| "स्वतन्त्रतायै" में विभक्ति और प्रत्यय? | चतुर्थी; तल् (स्वतन्त्र + तल्) | प्रयोजन (तादर्थ्य) → चतुर्थी |
| "आस्ताम्" का परिचय? | अस्, लङ्, प्रथम पुरुष, द्विवचन | दो कर्ता (पिता, माता) |
| "अगच्छत्" का परिचय? | गम्, लङ्, प्रथम पुरुष, एकवचन | भूतकाल |
| "मन्यन्ते" किस पद में? | आत्मनेपद (मन्, लट्, प्र.पु., बहु.) | -न्ते |
| "राष्ट्रपितरम्" में मूल शब्द? | राष्ट्रपितृ, द्वितीया एक. | पितृ जैसे रूप |
| "महात्मनः" में मूल शब्द और विभक्ति? | महात्मन्, षष्ठी एक. | आत्मन् जैसे रूप |
उत्तर में अपनी जानकारी मत जोड़ो — केवल अंश में जो लिखा है, वही। विकल्प में अंश से बड़ा या अलग दावा हो तो वह गलत।
अभ्यास — अपठित पद्यांश (श्लोक) Practice: Unseen Verse
श्लोक 1 — उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः। न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥
अन्वय: कार्याणि हि उद्यमेन सिध्यन्ति, मनोरथैः न। सुप्तस्य सिंहस्य मुखे मृगाः न हि प्रविशन्ति।
भावार्थ: काम परिश्रम से पूरे होते हैं, केवल इच्छा करने से नहीं। सोए हुए शेर के मुँह में हिरण अपने-आप नहीं घुसते।
अन्वय: कार्याणि हि उद्यमेन सिध्यन्ति, मनोरथैः न। सुप्तस्य सिंहस्य मुखे मृगाः न हि प्रविशन्ति।
भावार्थ: काम परिश्रम से पूरे होते हैं, केवल इच्छा करने से नहीं। सोए हुए शेर के मुँह में हिरण अपने-आप नहीं घुसते।
| प्रश्न | उत्तर | प्रश्न | उत्तर |
|---|---|---|---|
| कार्याणि केन सिध्यन्ति? | उद्यमेन | "सुप्तस्य" में प्रत्यय? | स्वप् + क्त, षष्ठी एक. |
| मृगाः कस्य मुखे न प्रविशन्ति? | सुप्तस्य सिंहस्य | "प्रविशन्ति" का परिचय? | प्र + विश्, लट्, प्र.पु., बहु. |
| "मनोरथैः" में विभक्ति-वचन? | तृतीया, बहुवचन | "मनोरथैः" का सन्धि-विच्छेद? | मनः + रथैः (विसर्ग → ओ) |
| "उद्यम" का विलोम? | आलस्यम् | उचित शीर्षक? | उद्यमस्य महत्त्वम् |
श्लोक 2 — विद्या ददाति विनयं विनयाद् याति पात्रताम्। पात्रत्वाद् धनमाप्नोति धनाद् धर्मं ततः सुखम्॥
अन्वय: विद्या विनयं ददाति, विनयात् पात्रतां याति, पात्रत्वात् धनम् आप्नोति, धनात् धर्मं, ततः सुखम् (आप्नोति)।
भावार्थ: विद्या से नम्रता, नम्रता से योग्यता, योग्यता से धन, धन से धर्म और धर्म से सुख मिलता है।
अन्वय: विद्या विनयं ददाति, विनयात् पात्रतां याति, पात्रत्वात् धनम् आप्नोति, धनात् धर्मं, ततः सुखम् (आप्नोति)।
भावार्थ: विद्या से नम्रता, नम्रता से योग्यता, योग्यता से धन, धन से धर्म और धर्म से सुख मिलता है।
| प्रश्न | उत्तर | प्रश्न | उत्तर |
|---|---|---|---|
| विद्या किं ददाति? | विनयम् | "पात्रताम्" में प्रत्यय? | तल् (पात्र + तल्), द्वितीया एक. |
| विनयात् किं याति? | पात्रताम् | "पात्रत्वात्" में प्रत्यय, विभक्ति? | त्व; पञ्चमी (हेतु) |
| धनात् किम् आप्नोति? | धर्मम् | "धनमाप्नोति" का विच्छेद? | धनम् + आप्नोति |
| "ददाति" का परिचय? | दा, लट्, प्र.पु., एक. | "विनयाद् याति" में सन्धि? | जश्त्व (त् → द्) |
श्लोक 3 — अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥
भावार्थ: "यह अपना है, वह पराया" — ऐसी गिनती छोटे मन वाले करते हैं; उदार चरित्र वालों के लिए तो पूरी पृथ्वी ही परिवार है।
भावार्थ: "यह अपना है, वह पराया" — ऐसी गिनती छोटे मन वाले करते हैं; उदार चरित्र वालों के लिए तो पूरी पृथ्वी ही परिवार है।
"वसुधैव" = वसुधा + एव (वृद्धि) · "वेति" = वा + इति (गुण) · "परो वेति" = परः + वा (विसर्ग → ओ, उत्व) · "लघुचेतसाम्" = लघु चेतः येषां ते (बहुव्रीहि), षष्ठी बहु. · "उदारचरितानाम्" — षष्ठी बहु.
"श्लोक का भाव?" · "वसुधैव में सन्धि?" (वृद्धि) · "लघुचेतसाम् में समास?" (बहुव्रीहि) · "'निजः' का विलोम?" (परः) · "'वसुधा' का पर्याय?" (पृथ्वी, धरा) · "श्लोक के पाद/अक्षर?" (4 पाद, अनुष्टुप् में हर पाद 8 अक्षर)