Chapter 3 · Grammar
कारक और विभक्ति
Karaka & Vibhaktiक्रिया के साथ जिसका सीधा सम्बन्ध हो, वह कारक है ("क्रियान्वयि कारकम्")। कारक छह हैं। सम्बन्ध (षष्ठी) और सम्बोधन कारक नहीं माने जाते, क्योंकि उनका सम्बन्ध क्रिया से सीधे नहीं होता। विभक्तियाँ सात हैं (सम्बोधन प्रथमा का ही रूप है)।
| कारक | परिभाषा सूत्र | विभक्ति सूत्र | चिह्न | उदाहरण |
|---|---|---|---|---|
| कर्ता | स्वतन्त्रः कर्ता | प्रथमा (कर्तृवाच्य में) · कर्तृकरणयोस्तृतीया (कर्मवाच्य में) | ने | रामः पठति · रामेण ग्रन्थः पठ्यते |
| कर्म | कर्तुरीप्सिततमं कर्म | कर्मणि द्वितीया | को | बालकः फलं खादति |
| करण | साधकतमं करणम् | कर्तृकरणयोस्तृतीया | से, द्वारा | सः लेखन्या लिखति |
| सम्प्रदान | कर्मणा यमभिप्रैति स सम्प्रदानम् | चतुर्थी सम्प्रदाने | के लिए | नृपः विप्राय गां ददाति |
| अपादान | ध्रुवमपायेऽपादानम् | अपादाने पञ्चमी | से (अलग होना) | वृक्षात् पत्रं पतति |
| अधिकरण | आधारोऽधिकरणम् | सप्तम्यधिकरणे च | में, पर | जले मत्स्याः वसन्ति |
| सम्बन्ध | (कारक नहीं) | षष्ठी शेषे | का, के, की | रामस्य पुत्रः |
| सम्बोधन | (कारक नहीं) | सम्बोधने च (प्रथमा) | हे, अरे | हे राम! |
अनभिहिते: जो कारक क्रिया से पहले ही कहा जा चुका हो (अभिहित), उसमें प्रथमा; न कहा गया हो तो उसकी अपनी विभक्ति। इसीलिए कर्मवाच्य में कर्म प्रथमा (ग्रन्थः) और कर्ता तृतीया (रामेण)। प्रथमा: "प्रातिपदिकार्थलिङ्गपरिमाणवचनमात्रे प्रथमा" — केवल नाम, लिङ्ग, परिमाण, वचन बताने में प्रथमा। अपादान में "ध्रुव" = जो स्थिर रहे (वृक्ष), जिससे अलग हुआ जाए। सम्प्रदान = जिसे दान/वस्तु दी जाए; इसके तीन रूप: अनिराकरण (सूर्याय अर्घ्यं ददाति), प्रेरणा (विप्राय गां ददाति), अनुमति (उपाध्यायाय गां ददाति)।
उपपद विभक्ति — द्वितीया
| किस शब्द के योग में | सूत्र / वार्तिक | उदाहरण |
|---|---|---|
| अभितः, परितः, समया, निकषा, हा, प्रति | अभितःपरितःसमयानिकषाहाप्रतियोगेऽपि | ग्रामम् अभितः वृक्षाः · विद्यालयं परितः · लङ्कां निकषा · ग्रामं समया · हा कृष्णाभक्तम् · भक्तः हरिं प्रति |
| उभयतः, सर्वतः, धिक्, उपर्युपरि | उभसर्वतसोः कार्या धिगुपर्यादिषु त्रिषु | कृष्णम् उभयतः गोपाः · धिक् दुर्जनम् |
| अन्तरा, अन्तरेण | अन्तरान्तरेण युक्ते | रामं श्यामं च अन्तरा · अन्तरेण हरिं न सुखम् |
| समय/दूरी का लगातार सम्बन्ध | कालाध्वनोरत्यन्तसंयोगे | मासम् अधीते · क्रोशं कुटिला नदी |
| द्विकर्मक धातु: दुह्, याच्, पच्, दण्ड्, रुध्, प्रच्छ्, चि, ब्रू, शास्, जि, मथ्, मुष् + नी, हृ, कृष्, वह् | अकथितं च | गां दोग्धि पयः · बलिं याचते वसुधाम् · माणवकं पन्थानं पृच्छति · अजां ग्रामं नयति |
| अभि + नि + विश्; अनु (लक्षण/हीन अर्थ) | अभिनिविशश्च · अनुर्लक्षणे · हीने | सन्मार्गम् अभिनिविशते · जपम् अनु प्रावर्षत् · अनु हरिं सुराः |
उपपद विभक्ति — तृतीया
| किस अर्थ / शब्द में | सूत्र | उदाहरण |
|---|---|---|
| सह, साकम्, सार्धम्, समम् (साथ) | सहयुक्तेऽप्रधाने | पुत्रेण सह पिता आगतः |
| शरीर के अंग का विकार | येनाङ्गविकारः | अक्ष्णा काणः · पादेन खञ्जः |
| पहचान का चिह्न | इत्थम्भूतलक्षणे | जटाभिः तापसः |
| कारण (हेतु) | हेतौ | अध्ययनेन वसति · पुण्येन दृष्टो हरिः |
| विना, पृथक्, नाना | पृथग्विनानानाभिस्तृतीयान्यतरस्याम् | रामेण / रामं / रामात् विना (तीनों सही) |
| तुल्य, सदृश (समानता) | तुल्यार्थैरतुलोपमाभ्यां तृतीयान्यतरस्याम् | कृष्णेन / कृष्णस्य तुल्यः |
कारक — तृतीया (शेष), चतुर्थी, पञ्चमी Upapada Vibhakti (contd.)
तृतीया — और नियम
| किस अर्थ / शब्द में | सूत्र | उदाहरण |
|---|---|---|
| अलम्, कृतम् (बस करो, निषेध) | (प्रयोग) | अलं विवादेन · कृतं कोलाहलेन |
| स्वभाव, गोत्र आदि | प्रकृत्यादिभ्य उपसंख्यानम् | प्रकृत्या साधुः · गोत्रेण गार्ग्यः |
| काम पूरा होने का समय | अपवर्गे तृतीया | मासेन व्याकरणम् अधीतम् |
उपपद विभक्ति — चतुर्थी
| किस अर्थ / शब्द में | सूत्र / वार्तिक | उदाहरण |
|---|---|---|
| नमः, स्वस्ति, स्वाहा, स्वधा, अलम् (समर्थ), वषट् | नमःस्वस्तिस्वाहास्वधाऽलंवषड्योगाच्च | गुरवे नमः · प्रजाभ्यः स्वस्ति · अग्नये स्वाहा · पितृभ्यः स्वधा · दैत्येभ्यः हरिः अलम् |
| रुच् (अच्छा लगना) — जिसे अच्छा लगे | रुच्यर्थानां प्रीयमाणः | हरये रोचते भक्तिः · बालकाय मोदकं रोचते |
| क्रुध्, द्रुह्, ईर्ष्य्, असूय् — जिस पर क्रोध | क्रुधद्रुहेर्ष्यासूयार्थानां यं प्रति कोपः | हरये क्रुध्यति · दुर्जनाय असूयति |
| स्पृह् (चाहना) — जिसकी चाह | स्पृहेरीप्सितः | पुष्पेभ्यः स्पृहयति |
| धृ (ऋण धारण करना) — जो ऋण देने वाला | धारेरुत्तमर्णः | भक्ताय धारयति मोक्षं हरिः |
| किसी प्रयोजन के लिए | तादर्थ्ये चतुर्थी वाच्या | मुक्तये हरिं भजति |
| क्रिया के लिए जाना (तुमुन् का अर्थ छिपा) | क्रियार्थोपपदस्य च कर्मणि स्थानिनः | फलेभ्यः याति (फल लाने जाता है) |
| हित, सुख; कल्पते/सम्पद्यते; राध्, ईक्ष् | हितयोगे च · क्लृपि सम्पद्यमाने च · राधीक्ष्योर्यस्य विप्रश्नः | ब्राह्मणाय हितम् · भक्तिः ज्ञानाय कल्पते · कृष्णाय राध्यति |
उपपद विभक्ति — पञ्चमी
| किस अर्थ / शब्द में | सूत्र | उदाहरण |
|---|---|---|
| भी (डरना), त्रा (बचाना) — डर का कारण | भीत्रार्थानां भयहेतुः | चौरात् बिभेति · व्याघ्रात् त्रायते |
| नियम से पढ़ना — जिससे पढ़ा जाए | आख्यातोपयोगे | उपाध्यायात् अधीते |
| जन् (उत्पन्न होना) — मूल कारण | जनिकर्तुः प्रकृतिः | ब्रह्मणः प्रजाः प्रजायन्ते |
| भू (निकलना) — उद्गम स्थान | भुवः प्रभवः | हिमवतः गङ्गा प्रभवति |
| वारण (रोकना) — जिससे रोका जाए | वारणार्थानामीप्सितः | यवेभ्यः गां वारयति |
| अन्य, इतर, ऋते, आरात्, दिशा-शब्द (पूर्व, उत्तर) | अन्यारादितरर्तेदिक्शब्दाञ्चूत्तरपदाजाहियुक्ते | कृष्णात् अन्यः · ऋते ज्ञानात् न मुक्तिः · ग्रामात् पूर्वम् |
| बहिः (बाहर) | बहिर्योगे पञ्चमी (वार्तिक) | ग्रामात् बहिः |
| प्रभृति, आरभ्य (से लेकर); आ (तक), अप, परि (छोड़कर) | प्रभृत्यादियोगे पञ्चमी (वार्तिक) · पञ्चम्यपाङ्परिभिः | कार्तिक्याः प्रभृति · आ मुक्तेः संसारः · अप हरेः संसारः |
| दूर, अन्तिक (पास) — पञ्चमी या षष्ठी | दूरान्तिकार्थैः षष्ठ्यन्यतरस्याम् | ग्रामात् / ग्रामस्य दूरम् |
| परा + जि (हार मानना) — जो सहा न जाए | पराजेरसोढः | अध्ययनात् पराजयते |
| दो में तुलना (विभाग) | पञ्चमी विभक्ते | माथुराः पाटलिपुत्रकेभ्यः आढ्यतराः |
एक वाक्य में सभी कारक: नृपः (कर्ता, प्रथमा) स्वहस्तेन (करण, तृतीया) गृहात् (अपादान, पञ्चमी) निर्गत्य मन्दिरे (अधिकरण, सप्तमी) विप्राय (सम्प्रदान, चतुर्थी) धनम् (कर्म, द्वितीया) ददाति।
कारक — षष्ठी, सप्तमी और विशेष नियम Genitive, Locative & Special Rules
उपपद विभक्ति — षष्ठी और सप्तमी
| किस अर्थ में | सूत्र | उदाहरण |
|---|---|---|
| शेष सम्बन्ध | षष्ठी शेषे | राज्ञः पुरुषः |
| उपरि, अधः, पुरतः, पृष्ठतः (दिशा वाले अव्यय) | षष्ठ्यतसर्थप्रत्ययेन | वृक्षस्य उपरि · ग्रामस्य पुरतः |
| स्मरण (याद करना) — जिसे याद करें | अधीगर्थदयेशां कर्मणि | मातुः स्मरति (मातरं स्मरति भी सही) |
| स्वामी, ईश्वर, अधिपति, साक्षी — षष्ठी या सप्तमी | स्वामीश्वराधिपतिदायादसाक्षिप्रतिभूप्रसूतैश्च | गवां / गोषु स्वामी |
| कृदन्त के कर्ता/कर्म | कर्तृकर्मणोः कृति | जगतः कर्ता · कृष्णस्य कृतिः |
| अनादर (परवाह न करके) — षष्ठी या सप्तमी | षष्ठी चानादरे | रुदतः / रुदति (पुत्रे) प्राव्राजीत् |
| "हेतु" शब्द के साथ कारण | षष्ठी हेतुप्रयोगे | अन्नस्य हेतोः वसति |
| समूह में से एक को अलग बताना (निर्धारण) | यतश्च निर्धारणम् | कवीनां / कविषु कालिदासः श्रेष्ठः (षष्ठी या सप्तमी) |
| आधार | सप्तम्यधिकरणे च | कटे आस्ते · गृहे वसति |
| एक क्रिया से दूसरी क्रिया का समय बताना (सति सप्तमी) | यस्य च भावेन भावलक्षणम् | रामे वनं गते दशरथः प्राणान् अत्यजत् · सूर्ये अस्तं गते गोपाः गृहम् अगच्छन् |
| साधु, निपुण (आदर के अर्थ में) | साधुनिपुणाभ्यामर्चायां सप्तम्यप्रतेः | मातरि साधुः · पितरि निपुणः |
| आयुक्त, कुशल (लगा हुआ) | आयुक्तकुशलाभ्यां चासेवायाम् | हरिपूजने कुशलः / आयुक्तः |
| निमित्त (जिस कारण कोई क्रिया) | निमित्तात्कर्मयोगे | चर्मणि द्वीपिनं हन्ति |
| स्निह् (प्रेम करना) — जिससे प्रेम | (प्रयोग) | पिता पुत्रे स्निह्यति |
आधार होने पर भी द्वितीया (कर्म)
| नियम | सूत्र | उदाहरण |
|---|---|---|
| अधि + शी (सोना), स्था (ठहरना), आस् (बैठना) → आधार = कर्म | अधिशीङ्स्थासां कर्म | हरिः वैकुण्ठम् अधिशेते · नृपः सिंहासनम् अधितिष्ठति · आसनम् अध्यास्ते |
| उप, अनु, अधि, आ + वस् (रहना) → आधार = कर्म | उपान्वध्याङ्वसः | हरिः वैकुण्ठम् उपवसति / अनुवसति / अधिवसति / आवसति |
ध्यान दो: "गृहे वसति" (सप्तमी) सही है, पर उपसर्ग लगते ही "गृहम् अधिवसति" (द्वितीया)।
प्रश्न: "___ सह सीता वनम् अगच्छत्" (रामेण — सहयुक्तेऽप्रधाने, तृतीया) · "___ नमः" (शिवाय — चतुर्थी) · "___ बिभेति" (सर्पात् — पञ्चमी) · "___ परितः जलम्" (दुर्गम् — द्वितीया) · "छात्राणां / छात्रेषु रमेशः पटुतमः" (निर्धारण — षष्ठी/सप्तमी)।
झटपट: "अभितः-परितः-धिक्-प्रति → 2" · "सह-विना-अंग दोष → 3" · "नमः-स्वाहा-रुच्-क्रुध्-स्पृह् → 4" · "भी-त्रा-ऋते-बहिः-अन्य → 5" · "निर्धारण → 6/7" · "सति, स्निह् → 7"
"ग्रामं परितः" में द्वितीया किस सूत्र से? · "नमः के योग में विभक्ति?" (चतुर्थी) · "चौरात् बिभेति में पञ्चमी क्यों?" (भीत्रार्थानां भयहेतुः) · "अपादान का परिभाषा सूत्र?" (ध्रुवमपायेऽपादानम्) · "रिक्त स्थान: ___ विना" (तीनों विभक्तियाँ) · "हरये रोचते भक्तिः में चतुर्थी?" (रुच्यर्थानां) · "कवीनां कालिदासः श्रेष्ठः में षष्ठी?" (निर्धारण)