Chapter 2 · Grammar
समास — परिभाषा, अव्ययीभाव, तत्पुरुष
Samasa: Avyayibhava & Tatpurushaदो या अधिक पद मिलकर एक पद बनें, तो उसे समास कहते हैं ("समसनं समासः" = संक्षेप करना)। समास से बना पद = समस्त पद; उसे तोड़कर अर्थ बताना = विग्रह। समास में बीच की विभक्ति का लोप होता है। पहला पद = पूर्वपद, दूसरा = उत्तरपद।
1️⃣अव्ययीभावपूर्वपद प्रधान, पहला पद अव्यय
2️⃣तत्पुरुषउत्तरपद प्रधान (भेद: कर्मधारय, द्विगु, नञ्, उपपद)
3️⃣द्वन्द्वदोनों पद प्रधान, "च" से जुड़ते हैं
4️⃣बहुव्रीहिअन्य पद प्रधान, कोई तीसरा अर्थ
संस्कृत में समास के चार मुख्य भेद हैं। कर्मधारय और द्विगु तत्पुरुष के ही भेद हैं; इन्हें अलग गिनें तो छह भेद होते हैं। प्रधानता: अव्ययीभाव — पूर्वपदार्थप्रधान · तत्पुरुष — उत्तरपदार्थप्रधान · द्वन्द्व — उभयपदार्थप्रधान · बहुव्रीहि — अन्यपदार्थप्रधान।
1. अव्ययीभाव समास
पहला पद अव्यय (उप, अनु, प्रति, यथा, निर्, अधि आदि), समस्त पद भी अव्यय बन जाता है और प्रायः नपुंसकलिङ्ग एकवचन (-म्) में दिखता है।
| समस्त पद | विग्रह | अव्यय का अर्थ |
|---|---|---|
| उपगङ्गम् | गङ्गायाः समीपम् | उप = समीप |
| उपकृष्णम् | कृष्णस्य समीपम् | उप = समीप |
| प्रतिदिनम् | दिनं दिनं प्रति | प्रति = प्रत्येक (वीप्सा) |
| यथाशक्ति | शक्तिम् अनतिक्रम्य | यथा = अनुसार |
| निर्मक्षिकम् | मक्षिकाणाम् अभावः | निर् = अभाव |
| अधिहरि | हरौ इति | अधि = में (सप्तमी अर्थ) |
2. तत्पुरुष समास — विभक्ति के नाम से
| भेद | समस्त पद | विग्रह |
|---|---|---|
| द्वितीया तत्पुरुष | कृष्णश्रितः · ग्रामगतः | कृष्णं श्रितः · ग्रामं गतः |
| तृतीया तत्पुरुष | हरित्रातः · शङ्कुलाखण्डः | हरिणा त्रातः · शङ्कुलया खण्डः |
| चतुर्थी तत्पुरुष | यूपदारु · गोहितम् | यूपाय दारु · गोभ्यः हितम् |
| पञ्चमी तत्पुरुष | चोरभयम् · वृकभीतिः | चोरात् भयम् · वृकात् भीतिः |
| षष्ठी तत्पुरुष | राजपुरुषः · देवालयः | राज्ञः पुरुषः · देवस्य आलयः |
| सप्तमी तत्पुरुष | अक्षशौण्डः · कार्यकुशलः | अक्षेषु शौण्डः · कार्ये कुशलः |
| नञ् तत्पुरुष | अब्राह्मणः · अनश्वः | न ब्राह्मणः · न अश्वः (स्वर से पहले "अन्") |
| उपपद तत्पुरुष | कुम्भकारः · जलजम् | कुम्भं करोति इति · जले जायते इति |
विग्रह में पहले पद की विभक्ति देखो — वही तत्पुरुष का नाम है। राज्ञः (षष्ठी) पुरुषः → षष्ठी तत्पुरुष। "न" से शुरू विग्रह → नञ्। उत्तरपद धातु से बना (कार, ज, ग) → उपपद।
समास — कर्मधारय, द्विगु, द्वन्द्व, बहुव्रीहि Karmadharaya, Dvigu, Dvandva, Bahuvrihi
3. कर्मधारय (तत्पुरुष का भेद)विशेषण + विशेष्य, या उपमान + उपमेय; दोनों पद एक ही विभक्ति में।
नीलोत्पलम् = नीलम् उत्पलम् · कृष्णसर्पः = कृष्णः सर्पः · महाराजः = महान् राजा · घनश्यामः = घन इव श्यामः (उपमान)
नीलोत्पलम् = नीलम् उत्पलम् · कृष्णसर्पः = कृष्णः सर्पः · महाराजः = महान् राजा · घनश्यामः = घन इव श्यामः (उपमान)
4. द्विगु (तत्पुरुष का भेद)पहला पद संख्या, अर्थ समूह (समाहार)।
पञ्चवटी = पञ्चानां वटानां समाहारः · त्रिलोकी = त्रयाणां लोकानां समाहारः · त्रिभुवनम् = त्रयाणां भुवनानां समाहारः · चतुर्युगम् = चतुर्णां युगानां समाहारः
पञ्चवटी = पञ्चानां वटानां समाहारः · त्रिलोकी = त्रयाणां लोकानां समाहारः · त्रिभुवनम् = त्रयाणां भुवनानां समाहारः · चतुर्युगम् = चतुर्णां युगानां समाहारः
5. द्वन्द्व समास — "च" वाला समास
| भेद | पहचान | उदाहरण (विग्रह) |
|---|---|---|
| इतरेतर | हर पद अलग गिना जाए; अन्त में पदों की संख्या के अनुसार द्विवचन/बहुवचन | रामलक्ष्मणौ = रामः च लक्ष्मणः च · रामलक्ष्मणभरतशत्रुघ्नाः · हरिहरौ = हरिः च हरः च |
| समाहार | समूह का अर्थ; नपुंसकलिङ्ग एकवचन | पाणिपादम् = पाणी च पादौ च एषां समाहारः · अहिनकुलम् = अहिः च नकुलः च |
| एकशेष | एक ही पद बचता है | पितरौ = माता च पिता च · हंसौ = हंसः च हंसी च |
6. बहुव्रीहि समास — तीसरे का अर्थ
दोनों पद मिलकर किसी अन्य (तीसरे) व्यक्ति/वस्तु को बताते हैं। विग्रह में यस्य / येन / यस्मै / यस्मिन् ... सः आता है।
| समस्त पद | विग्रह | अर्थ (अन्य पद) |
|---|---|---|
| पीताम्बरः | पीतम् अम्बरं यस्य सः | विष्णु / कृष्ण |
| दशाननः | दश आननानि यस्य सः | रावण |
| लम्बोदरः | लम्बम् उदरं यस्य सः | गणेश |
| चक्रपाणिः | चक्रं पाणौ यस्य सः | विष्णु |
| चन्द्रशेखरः | चन्द्रः शेखरे यस्य सः | शिव |
एक शब्द, दो समास: नीलकण्ठः = नीलः कण्ठः (नीला गला) → कर्मधारय; नीलः कण्ठः यस्य सः (शिव) → बहुव्रीहि। पीताम्बरम् = पीतम् अम्बरम् → कर्मधारय; पीताम्बरः (कृष्ण) → बहुव्रीहि।
पहचान का क्रम:
① पहला पद अव्यय → अव्ययीभाव
② पहला पद संख्या + समूह → द्विगु
③ विग्रह में "च" → द्वन्द्व
④ विग्रह में "यस्य सः" → बहुव्रीहि
⑤ विशेषण / "इव" → कर्मधारय
⑥ बाकी विभक्ति वाले → तत्पुरुष
① पहला पद अव्यय → अव्ययीभाव
② पहला पद संख्या + समूह → द्विगु
③ विग्रह में "च" → द्वन्द्व
④ विग्रह में "यस्य सः" → बहुव्रीहि
⑤ विशेषण / "इव" → कर्मधारय
⑥ बाकी विभक्ति वाले → तत्पुरुष
प्रश्न: "यथाशक्ति" में समास? → पहला पद "यथा" अव्यय → अव्ययीभाव। · "राजपुत्रः" = राज्ञः पुत्रः (षष्ठी तत्पुरुष)।
"पीताम्बरः में कौन-सा समास?" (बहुव्रीहि) · "उपगङ्गम् का विग्रह?" · "पञ्चवटी में समास?" (द्विगु) · "पितरौ किस द्वन्द्व का उदाहरण?" (एकशेष) · "उत्तरपदार्थप्रधान समास?" (तत्पुरुष) · "अन्यपदार्थप्रधान?" (बहुव्रीहि) · "घनश्यामः का विग्रह?" (घन इव श्यामः) · "अनश्वः किस समास में?" (नञ् तत्पुरुष)
समास — भेदों के उपभेद और सूत्र Sub-types & Sutras
तत्पुरुष — विभक्ति के सूत्र और अन्य भेद
| भेद | सूत्र | और उदाहरण |
|---|---|---|
| द्वितीया | द्वितीया श्रितातीतपतितगतात्यस्तप्राप्तापन्नैः | दुःखातीतः (दुःखम् अतीतः) · खट्वारूढः |
| तृतीया | तृतीया तत्कृतार्थेन गुणवचनेन | धान्यार्थः (धान्येन अर्थः) |
| चतुर्थी | चतुर्थी तदर्थार्थबलिहितसुखरक्षितैः | द्विजार्थः (द्विजाय अयम्) · भूतबलिः |
| पञ्चमी / षष्ठी / सप्तमी | पञ्चमी भयेन · षष्ठी · सप्तमी शौण्डैः | सिंहभयम् · गङ्गाजलम् · शास्त्रप्रवीणः |
| नञ् / उपपद | नञ् · उपपदमतिङ् | असत्यम् · अनुचितम् (न उचितम्) · जलदः (जलं ददाति इति) |
| प्रादि | उपसर्ग + संज्ञा | प्राचार्यः (प्रगतः आचार्यः) |
| अलुक् | बीच की विभक्ति नहीं हटती | युधिष्ठिरः (युधि स्थिरः) · खेचरः · सरसिजम् |
| मध्यमपदलोपी | बीच का पद हट जाता है | शाकपार्थिवः (शाकप्रियः पार्थिवः) |
कर्मधारय के भेदसूत्र: तत्पुरुषः समानाधिकरणः कर्मधारयः (दोनों पद एक विभक्ति में)
विशेषण-पूर्वपद: नीलोत्पलम् · विशेषणोभयपद: शीतोष्णम् (शीतं च तद् उष्णं च) · उपमान-पूर्वपद: घनश्यामः · उपमित (उपमान बाद में): पुरुषव्याघ्रः (पुरुषः व्याघ्रः इव) · रूपक: विद्याधनम् (विद्या एव धनम्), मुखकमलम् (मुखम् एव कमलम्)
विशेषण-पूर्वपद: नीलोत्पलम् · विशेषणोभयपद: शीतोष्णम् (शीतं च तद् उष्णं च) · उपमान-पूर्वपद: घनश्यामः · उपमित (उपमान बाद में): पुरुषव्याघ्रः (पुरुषः व्याघ्रः इव) · रूपक: विद्याधनम् (विद्या एव धनम्), मुखकमलम् (मुखम् एव कमलम्)
बहुव्रीहि के भेदसमानाधिकरण (दोनों पद एक विभक्ति): पीताम्बरः, चतुर्भुजः (चत्वारः भुजाः यस्य सः) · व्यधिकरण (अलग विभक्ति): चक्रपाणिः, चन्द्रशेखरः · सहार्थ: सपुत्रः (पुत्रेण सह वर्तमानः) · नञ्: अपुत्रः (अविद्यमानः पुत्रः यस्य सः) · प्रादि: निर्धनः (निर्गतं धनं यस्मात् सः)
अव्ययीभाव — और उदाहरणयावज्जीवम् (जीवनं यावत्) · आजन्म (आ जन्मनः — जन्म से लेकर) · आमरणम् (मरणपर्यन्तम्) · यथाविधि (विधिम् अनतिक्रम्य) · अनुरूपम् (रूपस्य योग्यम्) · प्रत्येकम् (एकम् एकम् प्रति) · उपकूलम् (कूलस्य समीपम्) · सचक्रम् (चक्रेण युगपत्) · बहिर्ग्रामम् (ग्रामात् बहिः)। समस्त पद अव्यय है, इसके रूप नहीं चलते।
द्विगु और द्वन्द्व — और नियमद्विगु: सप्ताहः (सप्तानाम् अह्नां समाहारः) · नवरात्रम् · त्रिफला · अष्टाध्यायी। समाहार द्विगु नपुंसक एकवचन या ई-अन्त स्त्रीलिङ्ग में।
द्वन्द्व में कम स्वर वाला पद पहले (अल्पाच्तरम्): शिवकेशवौ; स्वर से शुरू और अ-अन्त पद पहले (अजाद्यदन्तम्): ईशकृष्णौ। एकशेष को कई ग्रन्थ अलग वृत्ति मानते हैं; परीक्षा में यह द्वन्द्व के साथ पूछा जाता है।
द्वन्द्व में कम स्वर वाला पद पहले (अल्पाच्तरम्): शिवकेशवौ; स्वर से शुरू और अ-अन्त पद पहले (अजाद्यदन्तम्): ईशकृष्णौ। एकशेष को कई ग्रन्थ अलग वृत्ति मानते हैं; परीक्षा में यह द्वन्द्व के साथ पूछा जाता है।
द्विगु या बहुव्रीहि? संख्या वाला पद समूह बताए → द्विगु (त्रिलोकी, पञ्चवटी); किसी तीसरे को बताए → बहुव्रीहि (त्रिलोचनः = त्रीणि लोचनानि यस्य सः — शिव; चतुर्भुजः — विष्णु; दशाननः — रावण)।
"शीतोष्णम् में समास?" (कर्मधारय) · "सपुत्रः का विग्रह?" (पुत्रेण सह वर्तमानः) · "युधिष्ठिरः में कौन-सा समास?" (अलुक् तत्पुरुष) · "निर्धनः में?" (बहुव्रीहि) · "आजन्म का विग्रह?" · "त्रिलोचनः में द्विगु या बहुव्रीहि?" (बहुव्रीहि) · "कर्मधारय का सूत्र?"