Chapter 1 · Grammar
सन्धि — वर्ण और स्वर सन्धि
Sandhi: Letters & Vowel Sandhiदो वर्ण पास-पास आएँ तो उनके मेल से जो परिवर्तन होता है, उसे सन्धि कहते हैं। सूत्र: "परः सन्निकर्षः संहिता" (वर्णों की अत्यन्त निकटता = संहिता)। सन्धि को तोड़कर अलग लिखना = सन्धि-विच्छेद। भेद: स्वर (अच्) सन्धिव्यञ्जन (हल्) सन्धिविसर्ग सन्धि
वर्ण — सन्धि का आधार
स्वर (अच्)ह्रस्व: अ इ उ ऋ ऌ
दीर्घ: आ ई ऊ ॠ
सन्ध्यक्षर: ए ऐ ओ औ
ऌ का दीर्घ नहीं होता।
दीर्घ: आ ई ऊ ॠ
सन्ध्यक्षर: ए ऐ ओ औ
ऌ का दीर्घ नहीं होता।
व्यञ्जन (हल्)स्पर्श: क से म तक 25 (5 वर्ग)
अन्तःस्थ: य र ल व
ऊष्म: श ष स ह
अन्तःस्थ: य र ल व
ऊष्म: श ष स ह
अयोगवाहअनुस्वार (ं), विसर्ग (ः), जिह्वामूलीय, उपध्मानीय। वर्ग का पाँचवाँ वर्ण (ङ ञ ण न म) = अनुनासिक।
| उच्चारण स्थान | वर्ण | सूत्र (याद करो) |
|---|---|---|
| कण्ठ | अ, आ, क-वर्ग, ह, विसर्ग | अकुहविसर्जनीयानां कण्ठः |
| तालु | इ, ई, च-वर्ग, य, श | इचुयशानां तालु |
| मूर्धा | ऋ, ॠ, ट-वर्ग, र, ष | ऋटुरषाणां मूर्धा |
| दन्त | ऌ, त-वर्ग, ल, स | लृतुलसानां दन्ताः |
| ओष्ठ | उ, ऊ, प-वर्ग, उपध्मानीय | उपूपध्मानीयानाम् ओष्ठौ |
| नासिका (+ अपना स्थान) | ङ ञ ण न म; अनुस्वार केवल नासिका | ञमङणनानां नासिका च |
| कण्ठतालु / कण्ठोष्ठ | ए, ऐ / ओ, औ | एदैतोः कण्ठतालु · ओदौतोः कण्ठोष्ठम् |
| दन्तोष्ठ / जिह्वामूल | व / जिह्वामूलीय | वकारस्य दन्तोष्ठम् |
माहेश्वर सूत्र (14): अइउण् · ऋऌक् · एओङ् · ऐऔच् · हयवरट् · लण् · ञमङणनम् · झभञ् · घढधष् · जबगडदश् · खफछठथचटतव् · कपय् · शषसर् · हल्। इनसे प्रत्याहार बनते हैं: अक् = अ इ उ ऋ ऌ · इक् = इ उ ऋ ऌ · एङ् = ए ओ · एच् = ए ऐ ओ औ · अच् = सभी स्वर · हल् = सभी व्यञ्जन · यण् = य व र ल · जश् = ज ब ग ड द।
स्वर सन्धि — 1. दीर्घ, 2. गुण, 3. वृद्धि
| सन्धि / सूत्र | नियम | उदाहरण |
|---|---|---|
| दीर्घ अकः सवर्णे दीर्घः | अक् (अ इ उ ऋ) + वही (सवर्ण) स्वर → दीर्घ अ/आ+अ/आ=आ · इ/ई+इ/ई=ई · उ/ऊ+उ/ऊ=ऊ · ऋ+ऋ=ॠ | हिम+आलयः = हिमालयः · विद्या+आलयः = विद्यालयः · मुनि+इन्द्रः = मुनीन्द्रः · गुरु+उपदेशः = गुरूपदेशः · पितृ+ऋणम् = पितॄणम् |
| गुण आद्गुणः (अदेङ् गुणः: अ, ए, ओ = गुण) | अ/आ + इ/ई = ए अ/आ + उ/ऊ = ओ अ/आ + ऋ = अर् · + ऌ = अल् | महा+इन्द्रः = महेन्द्रः · महा+ईशः = महेशः · सूर्य+उदयः = सूर्योदयः · गङ्गा+उदकम् = गङ्गोदकम् · देव+ऋषिः = देवर्षिः · महा+ऋषिः = महर्षिः |
| वृद्धि वृद्धिरेचि (वृद्धिरादैच्: आ, ऐ, औ = वृद्धि) | अ/आ + ए/ऐ = ऐ अ/आ + ओ/औ = औ | सदा+एव = सदैव · एक+एकः = एकैकः · देव+ऐश्वर्यम् = देवैश्वर्यम् · वन+ओषधिः = वनौषधिः · महा+औषधिः = महौषधिः |
सन्धि — यण्, अयादि, पूर्वरूप, पररूप Vowel Sandhi (contd.)
| सन्धि / सूत्र | नियम | उदाहरण |
|---|---|---|
| 4. यण् इको यणचि | इक् (इ उ ऋ ऌ) के बाद असमान स्वर → इ/ई→य्, उ/ऊ→व्, ऋ→र्, ऌ→ल् | इति+आदि = इत्यादि · यदि+अपि = यद्यपि · सु+आगतम् = स्वागतम् · अनु+अयः = अन्वयः · मधु+अरिः = मध्वरिः · पितृ+आज्ञा = पित्राज्ञा |
| 5. अयादि एचोऽयवायावः | एच् के बाद कोई स्वर → ए→अय्, ऐ→आय्, ओ→अव्, औ→आव् | ने+अनम् = नयनम् · नै+अकः = नायकः · पो+अनः = पवनः · भो+अनम् = भवनम् · पौ+अकः = पावकः · नौ+इकः = नाविकः |
| 6. पूर्वरूप एङः पदान्तादति | पद के अन्त में ए/ओ + ह्रस्व अ → अ हट जाता है, उसकी जगह ऽ (अवग्रह) | हरे+अव = हरेऽव · वने+अत्र = वनेऽत्र · विष्णो+अव = विष्णोऽव · लोके+अस्मिन् = लोकेऽस्मिन् |
| 7. पररूप एङि पररूपम् | अ-अन्त उपसर्ग + ए/ओ से शुरू धातु → बाद वाला स्वर ही रहता है (वृद्धि नहीं) | प्र+एजते = प्रेजते · उप+ओषति = उपोषति |
| 8. प्रकृतिभाव ईदूदेद्द्विवचनं प्रगृह्यम् | ई, ऊ, ए पर समाप्त द्विवचन के बाद स्वर → सन्धि नहीं। अदसो मात्: अमी, अमू के बाद भी नहीं। निपात एकाजनाङ् / ओत्: एक-स्वर वाले निपात (इ, उ) और ओ-अन्त निपात (अहो) भी | हरी+एतौ = हरी एतौ · विष्णू+इमौ = विष्णू इमौ · लते+एते = लते एते · अमी ईशाः · अमू आसाते · इ इन्द्रः · उ उमेशः · अहो ईशाः |
| वृद्धि के अपवाद | एत्येधत्यूठ्सु: अ-अन्त उपसर्ग + इ (एति), एध् → वृद्धि (पररूप नहीं) · उपसर्गादृति धातौ: अ-अन्त उपसर्ग + ऋ से शुरू धातु → आर् · ऋते च तृतीयासमासे · अक्ष+ऊहिनी | उप+एति = उपैति · उप+एधते = उपैधते · प्र+ऋच्छति = प्रार्च्छति · सुख+ऋतः = सुखार्तः · अक्ष+ऊहिनी = अक्षौहिणी |
| वान्तो यि प्रत्यये | ओ/औ के बाद य से शुरू प्रत्यय → अव्/आव् | गो+यम् = गव्यम् · नौ+यम् = नाव्यम् |
घोष / अघोषअघोष: वर्ग के 1, 2 वर्ण + श ष स · घोष: वर्ग के 3, 4, 5 + य र ल व ह + सभी स्वर
अल्पप्राण / महाप्राणअल्पप्राण: वर्ग के 1, 3, 5 + य र ल व · महाप्राण: वर्ग के 2, 4 + श ष स ह
यण् vs अयादि: यण् में पहला स्वर इ/उ/ऋ (छोटे स्वर) होता है → आधा अक्षर बनता है (इत्यादि में "त्य")। अयादि में पहला स्वर ए/ऐ/ओ/औ होता है → "अय/आय/अव/आव" पूरा दिखता है (नयनम्, नायकः, पवनः, पावकः)।
गुण बनाम वृद्धि की पहचान: शब्द में ए/ओ/अर् दिखे → प्रायः गुण (महेशः, सूर्योदयः, महर्षिः); ऐ/औ दिखे → वृद्धि (सदैव, महौषधिः)। पर ने+अनम् जैसे शब्दों में ए पहले से है → अयादि।
प्रश्न: "पवित्रम्" का विच्छेद? → पो + इत्रम् (ओ + इ → अव् + इ) = अयादि। · "मन्वन्तरम्" = मनु + अन्तरम् (उ → व्) = यण्। · "रमेशः" = रमा + ईशः (आ + ई = ए) = गुण।
"हिमालयः में कौन-सी सन्धि?" (दीर्घ) · "इको यणचि किस सन्धि का सूत्र?" (यण्) · "नायकः का विच्छेद?" (नै+अकः) · "हरेऽव में ऽ क्यों?" (पूर्वरूप) · "हरी एतौ में सन्धि क्यों नहीं?" (प्रकृतिभाव) · "तालु से कौन-से वर्ण बोले जाते हैं?" · "ए का उच्चारण स्थान?" (कण्ठतालु) · "गुण किन्हें कहते हैं?" (अ, ए, ओ)
सन्धि — व्यञ्जन सन्धि Consonant Sandhi
| सन्धि / सूत्र | नियम | उदाहरण |
|---|---|---|
| श्चुत्व स्तोः श्चुना श्चुः | स् / त-वर्ग का योग श् / च-वर्ग से → स्→श्, त-वर्ग→च-वर्ग | रामस्+शेते = रामश्शेते · सत्+चित् = सच्चित् · उत्+ज्वलः = उज्ज्वलः · सत्+चरित्रम् = सच्चरित्रम् |
| ष्टुत्व ष्टुना ष्टुः | स् / त-वर्ग का योग ष् / ट-वर्ग से → स्→ष्, त-वर्ग→ट-वर्ग | रामस्+षष्ठः = रामष्षष्ठः · तत्+टीका = तट्टीका · उत्+डीनम् = उड्डीनम् · इष्+तः = इष्टः |
| जश्त्व झलां जशोऽन्ते | पद के अन्त का झल् (वर्ग का 1-4) → उसी वर्ग का तीसरा (ज ब ग ड द) | जगत्+ईशः = जगदीशः · वाक्+ईशः = वागीशः · षट्+आननः = षडाननः · अच्+अन्तः = अजन्तः · सुप्+अन्तः = सुबन्तः · दिक्+अम्बरः = दिगम्बरः |
| चर्त्व खरि च | झल् के बाद खर् (वर्ग का 1-2, श ष स) → झल् बनता है वर्ग का पहला | उद्+साहः = उत्साहः · सम्पद्+समयः = सम्पत्समयः |
| अनुनासिक यरोऽनुनासिकेऽनुनासिको वा | पदान्त वर्ण के बाद अनुनासिक → उसी वर्ग का पाँचवाँ (विकल्प से; प्रत्यय मय/मात्र हो तो नित्य) | वाक्+मयम् = वाङ्मयम् · जगत्+नाथः = जगन्नाथः · षट्+मासाः = षण्मासाः · तत्+मात्रम् = तन्मात्रम् |
| अनुस्वार मोऽनुस्वारः | पदान्त म् के बाद व्यञ्जन → अनुस्वार (ं); स्वर हो तो म् बना रहता है | हरिम्+वन्दे = हरिं वन्दे · गृहम्+गच्छति = गृहं गच्छति · पर गृहम्+आगच्छति = गृहमागच्छति |
| परसवर्ण अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः | अनुस्वार के बाद वर्ग का वर्ण → उसी वर्ग का पाँचवाँ | शां+तः = शान्तः · अं+कितः = अङ्कितः · कुं+ठितः = कुण्ठितः · गुं+फितः = गुम्फितः |
| तोर्लि (लत्व) | त-वर्ग + ल → ल् (न् → लँ) | तत्+लीनः = तल्लीनः · उत्+लेखः = उल्लेखः · विद्वान्+लिखति = विद्वाँल्लिखति |
| छत्व शश्छोऽटि | झय् के बाद श्, उसके बाद अट् (स्वर/ह/य/व/र) → श् बनता है छ् | तत्+शिवः = तच्छिवः · तत्+श्रुत्वा = तच्छ्रुत्वा |
| तुक् आगम छे च · आङ्माङोश्च | ह्रस्व स्वर, आ (आङ्), मा (माङ्) के बाद छ → बीच में च् (नित्य); दीर्घ के बाद विकल्प से | वृक्ष+छाया = वृक्षच्छाया · परि+छेदः = परिच्छेदः · आ+छादनम् = आच्छादनम् · लक्ष्मी+छाया = लक्ष्मीच्छाया / लक्ष्मीछाया |
| ङमुट् ङमो ह्रस्वादचि ङमुण्नित्यम् | ह्रस्व स्वर के बाद पदान्त ङ्/ण्/न् + स्वर → वह दोहरा | कुर्वन्+अपि = कुर्वन्नपि · तस्मिन्+एव = तस्मिन्नेव · सन्+अच्युतः = सन्नच्युतः |
| पूर्वसवर्ण (ह → ध/घ) झयो होऽन्यतरस्याम् | झय् के बाद ह → पिछले वर्ण का चौथा (विकल्प) | उद्+हरणम् = उद्धरणम् · तद्+हितम् = तद्धितम् · वाक्+हरिः = वाग्घरिः |
| उद् + स्था / स्तम्भ् उदः स्थास्तम्भोः पूर्वस्य | उद् + स्था → स् का लोप, त्थ | उद्+स्थानम् = उत्थानम् · उद्+स्थापनम् = उत्थापनम् |
| सुट् आगम सम्परिभ्यां करोतौ भूषणे | सम्/परि + कृ (सजाना अर्थ) → बीच में स् | सम्+कृतम् = संस्कृतम् · परि+कारः = परिष्कारः |
व्यञ्जन सन्धि की झटपट पहचान: त/द + च/ज → च्च/ज्ज (श्चुत्व) · त/द + ट/ड → ट्ट/ड्ड (ष्टुत्व) · त/द + ल → ल्ल (तोर्लि) · त/द + श → च्छ (श्चुत्व + छत्व) · त/द + ह → द्ध · क/त/ट/प + स्वर या घोष → ग/द/ड/ब (जश्त्व) · + न/म → ङ/न/ण/म (अनुनासिक)।
"सच्चित् में कौन-सी सन्धि?" (श्चुत्व) · "जगदीशः का विच्छेद?" (जगत्+ईशः, जश्त्व) · "वाङ्मयम् में सन्धि?" (अनुनासिक) · "तल्लीनः का विच्छेद?" · "संस्कृतम् में स् कहाँ से?" (सुट् आगम) · "उद्धरणम् का विच्छेद?" (उद्+हरणम्) · "कुर्वन्नपि में न् दोहरा क्यों?" (ङमुट्) · "आच्छादनम् में च् क्यों?" (तुक्)
सन्धि — विसर्ग सन्धि और अभ्यास Visarga Sandhi & Practice
विसर्ग सन्धि
| नियम | उदाहरण |
|---|---|
| सत्व (विसर्जनीयस्य सः): विसर्ग + च/छ → श्; + ट/ठ → ष्; + त/थ → स् | रामः+च = रामश्च · निः+चलः = निश्चलः · धनुः+टङ्कारः = धनुष्टङ्कारः · नमः+ते = नमस्ते |
| क ख प फ से पहले: अ/आ के बाद विसर्ग बना रहता है (कुप्वोः ≍क≍पौ च); इ/उ के बाद → ष् (इदुदुपधस्य चाप्रत्ययस्य); नमः, पुरः + कृ → स् (नमस्पुरसोर्गत्योः) | प्रातःकालः · पयःपानम् · निः+कामः = निष्कामः · दुः+कर्म = दुष्कर्म · निः+फलम् = निष्फलम् · चतुः+पादः = चतुष्पादः · नमः+कारः = नमस्कारः · पुरस्कारः · तिरस्कारः · भास्करः |
| श ष स से पहले (वा शरि): विसर्ग या तो वैसा ही रहे, या वही ऊष्म बने | दुः+शासनः = दुःशासनः / दुश्शासनः · हरिः+शेते = हरिः शेते / हरिश्शेते |
| उत्व: अ + विसर्ग + अ → ओ + ऽ (अतो रोरप्लुतादप्लुते) | रामः+अवदत् = रामोऽवदत् · शिवः+अर्च्यः = शिवोऽर्च्यः · सः+अपि = सोऽपि |
| उत्व: अ + विसर्ग + घोष व्यञ्जन (वर्ग का 3-5, य र ल व ह) → ओ (हशि च) | मनः+रथः = मनोरथः · यशः+दा = यशोदा · मनः+हरः = मनोहरः · बालः+गच्छति = बालो गच्छति |
| रुत्व: अ/आ के अलावा कोई स्वर + विसर्ग + स्वर/घोष → र् | निः+आशा = निराशा · निः+धनः = निर्धनः · दुः+गुणः = दुर्गुणः · गुरुः+अयम् = गुरुरयम् |
| रो रि: र् के बाद र् → पहला र् हटे, उससे पहले का स्वर दीर्घ | निः+रसः = नीरसः · निः+रोगः = नीरोगः · पुनः+रमते = पुना रमते |
| लोप (भोभगोअघोअपूर्वस्य योऽशि, लोपः शाकल्यस्य): आ + विसर्ग + स्वर/घोष → विसर्ग हटता है; भोः + स्वर/घोष → भो; अ + विसर्ग + अ से भिन्न स्वर → विसर्ग हटता है | बालाः+गच्छन्ति = बाला गच्छन्ति · देवाः+इह = देवा इह · भोः+अत्र = भो अत्र · अतः+एव = अत एव |
| सः / एषः + व्यञ्जन → विसर्ग लोप (एतत्तदोः सुलोपोऽकोरनञ्समासे हलि) | सः+गच्छति = स गच्छति · एषः+विष्णुः = एष विष्णुः |
| सन्धि-विच्छेद अभ्यास (शब्द = विच्छेद, सन्धि) | |||
|---|---|---|---|
| सज्जनः = सत्+जनः (श्चुत्व) | उन्नतिः = उत्+नतिः (अनुनासिक) | दिग्गजः = दिक्+गजः (जश्त्व) | सन्मार्गः = सत्+मार्गः (अनुनासिक) |
| तपोवनम् = तपः+वनम् (विसर्ग (उत्व)) | पयोधरः = पयः+धरः (विसर्ग (उत्व)) | दुर्जनः = दुः+जनः (विसर्ग (रुत्व)) | निर्मलः = निः+मलः (विसर्ग (रुत्व)) |
| पुनरागमनम् = पुनः+आगमनम् (विसर्ग (र्)) | नरेन्द्रः = नर+इन्द्रः (गुण) | प्रत्येकम् = प्रति+एकम् (यण्) | अन्वेषणम् = अनु+एषणम् (यण्) |
| गवेषणा = गो+एषणा (अयादि) | नाविकः = नौ+इकः (अयादि) | एकैकः = एक+एकः (वृद्धि) | रवीन्द्रः = रवि+इन्द्रः (दीर्घ) |
"नमस्ते में विसर्ग किसमें बदला?" (स्) · "मनोरथः का विच्छेद?" · "निराशा में कौन-सी सन्धि?" (विसर्ग) · "नीरसः का विच्छेद?" (निः+रसः) · "निष्कामः में विसर्ग → ?" (ष्) · "नमस्कारः का सूत्र?" (नमस्पुरसोर्गत्योः) · "रामोऽवदत् में कौन-सी सन्धि?" (विसर्ग, उत्व) · "भो अत्र में विसर्ग कहाँ गया?" (लोप)